भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 714

हिन्दी निरुक्त (३०१) ६ अ० ४ पा० ५ खं० र्पण करके सबके साथ पवित्र भाव से फिर मिले हुये को खाने में उसे पाप लगने का कोई अवसर नहीं आता । क्योंकि उस ने किसी तरह भी धन इकट्ठा किया, वह अपने लिये नहीं, किन्तु जिनसे (लोकसे) लिया उन्हींके लिये किया गया था ॥ 'इलीबिशः' (८५) यह एक पद अनवगत मेघ का नाम है । इसकी शब्दसमाधि 'इलाबिलशयः' (इला या शब्द का कारण जो जल उस के निकलने के बिलों को रोक कर शयन करने वाला) है । “न्याविध्यदिलीबिशस्य दृढा विशृङ्गिण मभि- नच्छुष्णमिन्द्रः” अर्थात् 'इन्द्रः' इन्द्र देवने 'इलीबिशस्य' (इलाबिलशयस्य) मेघ के 'दृढा' (दृढानि) दुर्भेद्य या दृढ स्थानों को 'न्याविध्यत्' (निरविध्यत्) भेदन किया । इतना ही नहीं किन्तु 'विशृङ्गिणम्' (शिखरवन्तम्) शिखर वाले अथवा (दीप्तिमन्तम्) बिजली से प्रकाशयुक्त मेघ को 'अभि- नत्' भेदन किया । यहां शब्द की समानता और अर्थके अवि- रोध से 'इलीबिश' मेघ है ॥ ४ (१६) ॥ (खं० ५) निघ०-कियेधाः ॥८६॥ सृमिः ॥८७॥ विष्विपतः ॥८८॥ निरु०-“अस्मा इदु प्रभरा तूतूजानो वृत्राय वज्रमी- शानः कियेधाः । गोर्न पर्व विरदा तिरश्चेष्य र्णांस्यपां चरध्यै ॥” (ऋ०सं० १, ४, २९, २) । अस्मै प्रहर तूर्णं त्वरमाणो वृत्राय वज्रमीशानः ।