भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 715, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 715

हिन्दी निरुक्त ( ३०२ ) ६ अ० ४ पा० ५ सं० ‘कियेधाः’ कियद्धा इतिवा । क्रममाणधा इति वा । गोरिव पर्वाणि विरद मेघस्य, इष्यन्-अर्णांसि, अपांचरणार्य ॥ ‘भृमिः’ भ्राम्यतेः । “भृमिरस्युपिकृन्मर्त्यानाम् ।” (ऋ०सं१,२,३५,२) इत्यपि निगमो भवति । ‘विष्पितः’ विप्राप्तः । “पारं नो अस्य विष्पितस्य पर्षन्” । (ऋ०सं० ५, ५, २, १) इत्यपि निगमो भवति ॥५ (२०)॥ ‘कियेधाः’ (८६) अनवगत ‘कियद्धाः’ (कितने भी अपरिमारा जलको धारण करने वाला) के अर्थमें, अथवा ‘क्रममाणधाः’ (क्रमण करता (चलता) हुये को धारण करने वाला ) के अर्थ में है, और मेघ का नाम है । “अस्मा इदु ”इस ऋचा का नोधानाम् गौतम ऋषि है, त्रिष्टुप् छन्द, इन्द्र देवता और आह्निक अहनों में अहीन सूक्त में विनियुक्त है । हे इन्द्र ! (एषः वृत्रः ) यह वृत्र या मेघ ‘कियेधाः’ (कियद्धाः ) कितने ही अपरिमारा जलको धारण किये हुये है, ‘अस्मै’ इस ‘वृत्राय’ मेघ के लिये तू ‘तुतुजानः’ (त्वरमाणः ) वेगसे युक्त हुआ हुआ ‘वज्रम्’ वज्र को ‘प्रभर’ मार । क्योंकि- तुम हमारे ‘ईशानः’ ईश्वर हो, इस कारण आपसे ऐसे कहा जाता है । और वज्र का प्रहार करके वज्र के प्रहार से व्याकुल हुये इस मेघ के ‘तिरश्चा’ तिरछे चलने वाले वज्र से ‘गोः’ गौके ‘न’ समान ‘पर्व’ (पर्वाणि) पर्वों या ‘सन्धियों को

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