निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ
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हिन्दी निरुक्त ( ३०३ ) ६ अ० ४ पा० ५ खं०
'विरद' विदारण कर अर्थात्-कोई गोका विकर्त्तन (छेदन)
करने वाला उसके पर्वों को काटता है, उसी प्रकार तू भी इस
मेघ के अवयवों को काट । किस अर्थ ? 'अर्णांसि' (जलानि)
जलों को 'इष्यन्' इच्छा करता हुआ 'अपां' जलों के 'चरथ्यै'
(चरणाय) प्रजाओं के अर्थ देने के लिये ॥
'भूमिः' (८७) यह अनवगत (भ्रमशाम्) घूमने वाला
के अर्थ में है । अनवस्थान (एक स्थान में नहीं टिकना)
अर्थ में 'भ्रम' (दिवा०प०) धातु से है, तथा अग्नि का नाम है।
"भूमिरस्यृषिकृन्मर्त्यानाम्" हे भगवन् ! अग्ने !
'त्वम्' तू 'मर्त्यानाम्' मनुष्यों का 'भूमिः' नाना योनियों में
जन्म व मरण के द्वारा घुमाने वाला और 'ऋषिकृत्' दर्शन
या विज्ञान का करने वाला 'असि' है । अर्थात् संसार और
उससे मोक्ष होना तुम्हारे ही अधीन है, इससे हमें सर्व वि-
ज्ञानके प्रदान से अनुग्रह करके इस संसार से आप छुड़ाओ ।
प्रयोजन यह कि-देवयान से ही हमें ले चल किन्तु पितृ-यान
से नहीं। इस प्रकार यहां 'भूमि' अग्नि है। क्योंकि ऐसे ही
अर्थ का अविरोध होता है ॥
• विष्वितः' (८८) यह अनवगत 'विप्राप्तः' (जहां
तहां फैला हुआ या सब जगह प्राप्त) के अर्थ में है ॥
"इमे दिवो अनिमिषा पृथिव्या श्चिकित्वांसो
अचेतसं नयन्ति । प्रत्राजे चिन्नद्योगाधमस्ति पारं
नो अस्य विष्वितस्य पर्षन् ॥" [ऋ०सं० ५, ५,
२, १] ॥
"यदद्यसूर्य ब्रवोऽनागाः " इस सूक्त की "इमे-