निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३०४ ): ६ अ० ४ पा० ५ खं० दिवः " यह ऋचा है। इस सूक्त पर शौनक ने अपने प्रति- ज्ञा सूत्र में कहा है-कि-इस सूक्त की पहिली ऋचा सूर्य देवता की है, और सब मित्रावरुण देवताओं की हैं। इसके अनुसार " इमेदिवः " यह ऋचा मित्रावरुण इन दोनों ही की है इस मतमें 'इमे' यह बहुवचन पूजा में है। क्योंकि-देवसंख्या द्वित्व या दो ( २ ) है, जिसके अनुसार द्विवचन ही चाहिये था। भगवद्दुर्गाचार्य कहते हैं कि-इस सूक्त में तीसरा अर्यमा देवता भी प्रत्यक्ष होता है, इस कारण 'इमे' इत्यादि बहुवचन मित्र वरुण और अर्यमा इन तीनों की बहुत्व संख्या के कारण है, किन्तु पूजा के कारण नहीं, अतः शौनक का मत विचारणीय है । 'इमे' ये मित्र और वरुण देवता अथवा 'मित्र, वरुण और अर्यमा देवता 'दिवः' (एत्य ) द्युलोक से आकर 'अनि- मिषाः' आलस्य रहित तथा 'चिकित्वांसः' प्राणियों के सुकृत और दुष्कृतों ( पापों) को जानते हुए 'अचेतसम्' मरे हुए ( प्रेत ) प्राणी को 'पृथिव्याः' पृथिवी से ( अमुं लोकम् ) कर्म के अनुसार उस लोक को 'नयन्ति' ले जाते हैं। जिस से कि ऐसा है, इस लिए उन से मैं कहता हूं-'प्रव्राजे' (प्रकृष्टे व्रजने मरणारूपे काले ) बड़े गमन या मरण-काल के आजाने पर यदि 'गाधम्' संसार के पार करने में समर्थ हमारा कोई कर्म या विज्ञान 'अस्ति' है, तो वे 'नद्यः ( नद्याः ) नदी के 'चित्' समान 'विष्पितस्य' लम्बे या सब संसार में व्यापक 'अस्य' इस संसार रूप मार्ग के 'पारम्' पार 'पर्षन्' (नयन्तु) ले जावें । यह भी निगम है। इस प्रकार यहां शब्द की समानता और अर्थ के अविरोध से 'विष्पितः शब्द 'विप्रासः'