निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३०५ ) ६ अ० ४ पा० ६ खं० के अर्थ में है । जो लोग “ गरुड पुराण ” के प्रेतकल्प की समूलता और मरे हुए प्राणियों के देवताओं के प्रबन्धसे परलोक गमन को वेद में देखना चाहते हैं, वे इस मन्त्र को ध्यान से पढ़ें । इस मन्त्र में-“देवताओंका मरे हुए को इस लोक से परलोक में लेजाना और उनको उनके कर्मों के अनुसार सुख दुःख मिलने का बहुत उत्तम प्रबन्ध किया हुआ ” बतायागया है । प्रबन्ध की उज्ज्वलता जानने के लिये देवताओंके दो विशेषण ध्यान से देखने योग्य हैं । (१) “अनिमिषाः” जो देवता इस पृथिवी से प्राणि- यों को उस लोक में ले जाते हैं, उनकी पलक कभी नहीं झिपती वे सदा ही अपने कर्त्तव्य में जागते रहते हैं, इस से कोई यह न समझे कि-उनके सोजाने के समय हमारा मृत्यु का समय आजावेगा, तो फिर हम न मरेंगे और न अपने कर्मों के फल को ही भोगेंगे । (२) “चिकित्वान्स.” वे देवता प्राणियों के पाप पुण्यों को भले प्रकार जानते हैं, बिना मीमांसा या नियम विरुद्ध अथवा अन्याय पूर्वक किसी के साथ बर्ताव नहीं कर सकते ॥ ५ ( २० ) ॥ ( खं० ६ ) निघ०- तुरीपम् ॥ ८६ ॥ रास्पिनः ॥ ६० ॥ ऋजतिः ॥ ९१ ॥ ऋजुनीती ॥ ९२ ॥ प्रतद्वसू ॥ ६३ ॥ ३६