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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

हिन्दी निरुक्त ( ३०४ ): ६ अ० ४ पा० ५ खं० दिवः " यह ऋचा है। इस सूक्त पर शौनक ने अपने प्रति- ज्ञा सूत्र में कहा है-कि-इस सूक्त की पहिली ऋचा सूर्य देवता की है, और सब मित्रावरुण देवताओं की हैं। इसके अनुसार " इमेदिवः " यह ऋचा मित्रावरुण इन दोनों ही की है इस मतमें 'इमे' यह बहुवचन पूजा में है। क्योंकि-देवसंख्या द्वित्व या दो ( २ ) है, जिसके अनुसार द्विवचन ही चाहिये था। भगवद्दुर्गाचार्य कहते हैं कि-इस सूक्त में तीसरा अर्यमा देवता भी प्रत्यक्ष होता है, इस कारण 'इमे' इत्यादि बहुवचन मित्र वरुण और अर्यमा इन तीनों की बहुत्व संख्या के कारण है, किन्तु पूजा के कारण नहीं, अतः शौनक का मत विचारणीय है । 'इमे' ये मित्र और वरुण देवता अथवा 'मित्र, वरुण और अर्यमा देवता 'दिवः' (एत्य ) द्युलोक से आकर 'अनि- मिषाः' आलस्य रहित तथा 'चिकित्वांसः' प्राणियों के सुकृत और दुष्कृतों ( पापों) को जानते हुए 'अचेतसम्' मरे हुए ( प्रेत ) प्राणी को 'पृथिव्याः' पृथिवी से ( अमुं लोकम् ) कर्म के अनुसार उस लोक को 'नयन्ति' ले जाते हैं। जिस से कि ऐसा है, इस लिए उन से मैं कहता हूं-'प्रव्राजे' (प्रकृष्टे व्रजने मरणारूपे काले ) बड़े गमन या मरण-काल के आजाने पर यदि 'गाधम्' संसार के पार करने में समर्थ हमारा कोई कर्म या विज्ञान 'अस्ति' है, तो वे 'नद्यः ( नद्याः ) नदी के 'चित्' समान 'विष्पितस्य' लम्बे या सब संसार में व्यापक 'अस्य' इस संसार रूप मार्ग के 'पारम्' पार 'पर्षन्' (नयन्तु) ले जावें । यह भी निगम है। इस प्रकार यहां शब्द की समानता और अर्थ के अविरोध से 'विष्पितः शब्द 'विप्रासः'

हिन्दी निरुक्त ( ३०५ ) ६ अ० ४ पा० ६ खं० के अर्थ में है । जो लोग “ गरुड पुराण ” के प्रेतकल्प की समूलता और मरे हुए प्राणियों के देवताओं के प्रबन्धसे परलोक गमन को वेद में देखना चाहते हैं, वे इस मन्त्र को ध्यान से पढ़ें । इस मन्त्र में-“देवताओंका मरे हुए को इस लोक से परलोक में लेजाना और उनको उनके कर्मों के अनुसार सुख दुःख मिलने का बहुत उत्तम प्रबन्ध किया हुआ ” बतायागया है । प्रबन्ध की उज्ज्वलता जानने के लिये देवताओंके दो विशेषण ध्यान से देखने योग्य हैं । (१) “अनिमिषाः” जो देवता इस पृथिवी से प्राणि- यों को उस लोक में ले जाते हैं, उनकी पलक कभी नहीं झिपती वे सदा ही अपने कर्त्तव्य में जागते रहते हैं, इस से कोई यह न समझे कि-उनके सोजाने के समय हमारा मृत्यु का समय आजावेगा, तो फिर हम न मरेंगे और न अपने कर्मों के फल को ही भोगेंगे । (२) “चिकित्वान्स.” वे देवता प्राणियों के पाप पुण्यों को भले प्रकार जानते हैं, बिना मीमांसा या नियम विरुद्ध अथवा अन्याय पूर्वक किसी के साथ बर्ताव नहीं कर सकते ॥ ५ ( २० ) ॥ ( खं० ६ ) निघ०- तुरीपम् ॥ ८६ ॥ रास्पिनः ॥ ६० ॥ ऋजतिः ॥ ९१ ॥ ऋजुनीती ॥ ९२ ॥ प्रतद्वसू ॥ ६३ ॥ ३६

हिन्दी निरुक्त ( ३०६ ) ६ अ० ४ पा० ६खं० निरु०-“ तन्नस्तुरीपमद्भुतं पुरुवारं पुरुत्मना । त्वष्टा पोषाय विष्यतु राये नाभानो अस्मयुः ॥ ” [ ऋ०सं० २, २, ११, ४] ॥ तत् नः तूर्णापि महत् सम्भृतम् आत्मना त्वष्टा धनस्य पोषाय विष्यतु-इति । ‘अस्मयुः’ अस्मान् कामयमानः ॥ ‘रास्पिनः’ रास्पी रपतेर्वा । रसतेर्वा । “ रास्पिनस्यायोः ” ॥ [ ऋ० सं०२,१,१,४] । इत्यपि निगमो भवति ॥ ‘ऋञ्जतिः’ प्रसाधनकर्मा । ( “आवऋञ्जसे ऊर्जा व्युष्टिषु ।” (ऋ०सं० ८, ३, १०, १ ) इत्यपि निगमो भवति ॥ ) ‘ऋजुः’-इत्यपि अस्य भवति । “ऋजुनीती नो वरुणः” । (ऋ०सं०१,६,१७,१) इत्यपि निगमो भवति । ‘प्रतद्वसू’ प्राप्तवसू । “हरी इन्द्र प्रतद्वसू अभिस्वर” । ( ऋ०सं० ६, १, १२, २, ) । इत्यपि निगमो भवति ॥ ६ (२१) ॥ ‘तुरीपम्’ (८६) यह अनवगत ‘तूर्णापि’ ( झटपट व्यापन होने वाला ) के अर्थ में है । जल का नाम है । क्यों कि-वह तूर्ण (शीघ्र) व्याप जाता है । अर्थः- “तन्नस्तुरीपम्” इस ऋचाका दीर्घतमा ऋषि,

हिन्दी निरुक्त ( ३४७ ) ६ अ० ४ पा० ६ खं० त्वष्टा देवता, अनुष्टुप् छन्द, है, और यह ऋचा आप्री सूक्त में है, अर्थात्- उसी के विनियोग में इस का विनियोग है, स्वतन्त्र नहीं । 'नाभानः' ( न-अभानः = सदा दीप्यमानः ) सदा चमक- ने वाला 'अस्मयुः' हमारे ऊपर अनुग्रह करने की कामना करता हुआ 'त्वष्टा' त्वष्टा देव 'राये' ( रायः = धनस्य ) धन के 'पोषाय' पोषण के लिये 'तत्' वह 'तुरीपम्' ( तूर्णापि ) जलं 'विष्यतु' बरसे या बरसावे ( यत् ) जो 'अद्भुतम्' ( महत् संभूतम् ) बहुत ही उत्तम 'पुरुत्मना' ( आत्मना ) (बह्वात्म- ना) अनेकरूपसे 'पुरुवारम्' देशान्तर में आवरण करने (छाजाने) वाला हो । यहां 'त्वष्टा' मध्यम लोकके देवता और 'विष्यतु' ( वर्षतु ) के सम्बन्धसे 'तुरीप' जल है, यह उपपन्न होता है । इस मन्त्र में उत्तम जलकी अपेक्षा दिखलाई है । जितना ही उत्तम जल बरसेगा उतना ही आरोग्य और आयुः-वृद्धि आदि का कारण होगा । क्योंकि-जलसे ही ओषधि वनस्पति आदि सब जीवन साधन होते हैं, उनमें जलके ही अनुसार बल नीरोगता आदि गुण होते हैं, तथा स्वयम् जल पान में उपयुक्त होकर उदर में अपनी उत्तमता के अनुसार लाभ देता है । ४ अस्मयुः ' यहां ' * अस्मान् कामयमानः ' हमें चाहने वाला ॥ 'रास्पिन' (६७) क्या ? 'रास्पी' शब्द करने वाला (जल) अथवा स्तुति करने वाला ( पुत्र ) । कैसे ? शब्दार्थक ' रप ' (भ्वा० प०) धातु से अथवा शब्दार्थक ही ' रस ' (भ्वा०प०) धातु से !

हिन्दी निरुक्त ( ३०८ ) ६ अ० ४ पा० ६ खं० “रास्पिनस्यायोः” अर्थात् 'रास्पिनस्य' शब्द करने वाले या स्तुति करने वाले 'आयोः' जल की या पुत्र की प्राप्ति के अर्थ ( हे ऋत्विजो ! ऐसा करो ।) यह भी निगम होता है । इस प्रकार यहां 'रास्पिन' शब्द से जल अथवा स्तोता कहा गया है । 'ऋञ्जति' ( ६१ ) यह धातु प्रसाधन या किसी को अपने अनुकूल बनाने अर्थ में है । भगवद्दुर्गाचार्य कहते हैं कि इस शब्द को 'भाऋञ्जीक' शब्द के समान समझ कर भाष्यकार ने इस का निगम नहीं पढा । इस से जान पड़ता है—मुद्रित पुस्तकों में यहां पर “आवऋञ्जसे ऊर्जा व्युष्टिषु” यह जो निगम दिया हुआ है, वह पीछे से निविष्ट किया हुआ है, या उक्त आ- चार्य के समीपस्थ पुस्तकों में न था । इस उद्धृत खण्ड का अब तक पता भी नहीं चला है कि यह कहां का है । 'ऋजु' ( ६२ ) यह भी इस 'ऋञ्ज' ( भ्वा० प० ) धातु का ही है । “ऋजुनीती नो वरुणः ( मित्रो नयतु विद्वान् । अर्यमा देवैः सजोषाः ॥”) (ऋ० सं० १, ६, १७, १, ) ॥ अर्थात्–'ऋजुनीती' सरलनीति वाला या सरलबुद्धि वाला 'वरुणः'वरुणदेव 'विद्वान्' विद्वान् 'मित्रः' मित्रदेव और 'अर्यमा' अर्यमा देव 'देवैः' देवताओं के साथ 'सजोषाः' प्रसन्न होता हुआ 'नः' हम को 'नयतु' इस लोक से परलोक में ले जावे । यहां ऋजु शब्द शब्द की समानता से 'ऋञ्ज' धातु से ही है, अर्थ इस का प्रसिद्ध अथवा सरल हो सकता है ।

हिन्दी निरुक्त ( ३०६ ) ६ अ० ४ पा० ७ खं० 'प्रतद्वसू' ( ६३ ) यह अनवगत 'प्राप्तवसू' ( जिन्होंने धन को प्राप्त कर लिया हो ऐसे दो ) के अर्थ में है । 'अश्वौ' ( दो घोड़े ) अर्थ है । “हरी इन्द्र प्रतद्वसू अभिस्वर” अर्थात्-'इन्द्र' हे इन्द्र ! देव ! तेरे 'हरी' दोनों घोड़े 'प्रतद्वसू' अपने ऋजीष ( सोम के खखस या धान रूप धन को यज्ञ में प्राप्त हो गये हैं, इस से तू 'अभि स्वर' हमारी ओर आ । यह भी निगम है । इस प्रकार यहां 'हरी' इस पद के संबन्ध से 'प्रतद्वसू' यह शब्द 'प्राप्तवसू' ( प्राप्त धन ) के अर्थ में उपपन्न होता है ॥ ५ (२१) ॥ ( खं० ७ ) निघ०-हिनोत ॥९४॥ चोष्कूयमाणः ॥ ९५॥ चोष्कूयते ॥ ९६ ॥ सुमतू ॥ ९७ ॥ दिविष्टिषु ॥ ९८ ॥ निरु०-“हिनोता नो अध्वरं देवयज्या हिनोत ब्रह्म सनये धनानाम् । ऋतस्य योगे विष्यध्वमूर्धः श्रुष्टीवरी भूतनास्मभ्यमापः ॥” ( ऋ० सं० ७, ७, २६, १ ) ॥ प्रहिणुत नोऽध्वरं देवयज्यायै । प्रहिणुत ब्रह्म धनस्य सवनाय । ऋतस्य योगे यज्ञस्य योगे याज्जे शकटे इतिवा । 'शकटं' शक्रदितं भवति। शनकैस्तर्कति-इतिवा ।

हिन्दी निरुक्त ( ३१० ) ६ अ० ४ पा० ७ खं० शब्देन तकति इति वा । “श्रुष्टीवरी भूतनास्मभ्य मापः । ” सुखवत्यो भवता मस्मभ्यमापः ॥ “ चोष्कूयमाण इन्द्र भूरिवामम् । ” (ऋ०सं० १, ३, १, ३) । ददत् इन्द्रं बहु वननीयम् । “एधमान द्विळुभयस्य राजा चोष्कूयते विशं इन्द्रो मनुष्यान् ” ॥ (ऋ०सं० ४, ७,३३, १) ॥ व्युदस्यति एधमानान् असुन्वतः, सुन्वतः- अभ्यादधाति । “ उभयस्य राजा ” दिव्यस्य च पार्थिवस्य च । ‘ चोष्कूयमाणः’-इति चोष्कूयतेः-चर्करीत- वृत्तम् ॥ ‘ सुमत् ’ स्वयम्–इत्यर्थः । “ उप प्रागात्सुमन्मेध्यायि मन्म । ” (ऋ०सं० २, ३, ८, २) । उपप्रैतुमां स्वयं यन्मे मनोऽध्यायि यज्ञेन-इति आश्वमेधिको मन्त्रः ॥ ‘ दिविष्टिषु ’ दिव एषणेषु ॥ ७ ॥ 'हिनोत' (६४) यह अनवगत 'प्रहिणुत' (प्रेरित करो) के अथमे है ।

हिन्दी निरुक्त ( ३११ ) दै० अ० ४ पा० ७ खं० “हिनोतानो” यह ऋचा कवष ऋषि की है। अपोनप्त्रीय ऋचाओं में शस्त्र है। अर्थः- हे (ऋत्विजः !) ऋत्विजो ! 'देवयज्या' (देव- यज्यायै) देवताओंके यजनके अर्थ 'अध्वरम्' यज्ञ को 'हिनो- त' (प्रहिणुत) प्रेरितकरो (भले प्रकार चलाओ) । और हमें 'धनानाम्' धनोंकी 'सनये' (सधनाय = लब्धये) प्राप्ति के लिये (यूयम्) तुम सब 'ब्रह्म' स्तुतिरूप वेद को 'हिनोत' (प्रहिणुत) प्रेरित करो (उच्चारण करो) । 'ऋतस्य योगे' (यज्ञस्य योगे अथवा याज्ञे शकटे) और यज्ञ के संयोग में अथवा यज्ञ-सम्बन्धि शकट में जो 'ऊधः' ओंढी के समान अधिपवण-चर्म (सोमरस घालने के लिये ग्रह चमस, और स्थाली आदि पात्रोंके नीचे बिछाया जाने वाला चर्म) को 'विष्यध्वम्' छोड़ दो। इस प्रकार ऋत्विजों से कहकर सोमसे मिले हुए जलों से कहता है- 'आपः !' हे जलो ! (जलसमूह !) तुम 'अस्मभ्यम्' हमारे लिए 'शृणीवरीः' (सुखवत्यः) सुख देने वाली 'भूतन' (भवत) होओ । 'शकट' क्यों ? शकृदित या गोबर से सना हुआ जैसा होता है। क्योंकि-जब उसमें जुताहुआ बैल गोबर करता है, तब उस गोबर से वह शकट या गाड़ा भी लिप्त हो जाता है। अथवा- 'शनकैः-तकति' बोझसे दबा हुआ धीरे धीरे चलता है। अथवा-'शब्देन तकति' शब्द करता हुआ चलता है, इससे 'शकट' है । 'चोष्कूयमाणः' (६५) और 'चोष्कूयते' (९६) ये दो अनवगत हैं। इनमें धातु ही अप्रतीत है। इन दोनों में पहिला सुबन्त (नाम) और दूसरा तिङन्त (आख्यात) है। पहिले का अर्थ 'देता हुआ, और दूसरे का अर्थ 'हटाता

हिन्दी निरुक्त (३१२) ६ अ० ४ पा० ७ खं० है,-यह है। दोनों में 'कु' (अदा० प०) मूल धातु है, और वही 'यङ्' प्रत्यय के योग से 'चोष्कूय' के रूप में संयुक्त धातु हो गया है, उसी के ये नाम और आख्यात नाम वाले दो रूप बने हैं। प्रथम का उदाहरण— “चोष्कूयमाण इन्द्र भूरि वामम्” अर्थात्- 'इन्द्र' ! हे इन्द्र ! 'भूरि' (बहु) बहुत 'वामम्' (वननीयम्) वाञ्छनीय जल को 'चोष्कूयमाणः' (ददत्) देता हुआ (“मा पणिर्भूः”) बनिये के समान कृपण (सूंजी) मत हो। इस प्रकार यहां 'वणिक के समान मत हो' 'बहुत वाञ्छनीय' इन पदों के सम्बन्ध से 'चोष्कूयमाणः' पद 'ददत्' (देताहुआ) के अर्थ में है। दूसरे अर्थ का उदाहरण— “एधमान द्विलुभयस्य राजा चोष्कूयते विश इन्द्रो मनुष्यान्” अर्थात्-‘इन्द्रः’ इन्द्रदेव 'एधमान द्विट्' (एधमानान् अपि असुन्वतः द्वेष्टि) बढते हुओं (सम्पत्ति- मानों) को भी जो सोम का सवन नहीं करते-उसकी आज्ञा में नहीं चलते, द्वेष करता है। और (सुन्वतः अभ्यादधाति) सवन करने वालों या आज्ञामें चलने वालों को ऊँचा करता है, या अभ्युदयसे संयुक्त करता है। 'उभयस्य राजा' (दिव्यस्य च पार्थिवस्य च राजा) द्युलोक के धनका और पृथिवी के धन का राजा (स्वामी) है। और 'विशः' बढते हुए नहीं यजन करनेवाले मनुष्यों को 'चोष्कूयते' (व्युदस्यति) अभ्युदयसे हटाता है, एवम् 'मनुष्यान्' अपने को पूजने वाले मनुष्यों को उन्नत करता है। इस प्रकार यहां 'चोष्कूयते' पद 'व्युदस्यति' (हटाता है-गिराता है-दण्डित करता है) के अर्थ में है। क्योंकि-'एधमानद्विट् (बढते हुओं से द्वेष करने वा) शब्द से

हिन्दी निरुक्त ( ३१३ ) ६ अ० ४ पा० ८ खं० यही बात आती है । इस मन्त्र का यह अभिप्राय है कि जो इन्द्र के पूजक या उस की आज्ञा में चलने वाले हैं, वे उस के इष्ट या प्यारे हैं, और जो उस की पूजा या आज्ञा स्वीकार नहीं करते, वे उस के द्वेष्य या अप्रिय हैं, चाहे वे बड़ी सम्पत्ति वाले क्यों न हों। इन्द्र देव पर किसी की सम्पत्ति या वैभव का कोई प्रभाव नहीं पड़ता, उस के न्यायालय में “दूध का दूध और पानी का पानी” ही होता है। इसी से दरिद्र हो या धन- वान् सब को सिर झुकाकर उसकी आज्ञा में रहना चाहिए । 'चोषकूयमाण' यह चोषकूयति का चर्करीत वृत्त या यङन्त- वृत्ति का प्रयोग है । 'सुमत्' (६७) यह अनवगत 'स्वयम्' (आप) के अर्थ में है। “उप प्रागात्सुमन्मेधायि मन्म” (उपैतु मां स्वयं यन्मे मनः अध्यायि यज्ञेन) मुझे वह आप से आप प्राप्त हो, जो यज्ञ से मेरे मन में आया है। यह अश्वमेध यज्ञ का मन्त्र है । 'दिविष्टिषु' (६८) अनवगत 'दिवः एषणेषु' (द्यु लोक को प्राप्त कराने वाली क्रियाओं में) के अर्थ में है ॥७॥ ( खं० ८ ) निघ०—दूतः ॥९९॥ जिन्वति ॥१००॥ निरु०-“स्थूरं राधः शताश्वं कुरुङ्गस्य दिवि- ष्टिषु ।” (ऋ० सं० ५, ७, ३३, ४) । 'स्थूरः' समाश्रितमात्रो महान् भवति । ४०

हिन्दी निरुक्त ( ३१४ ) ६ अ० ४ पा० ८ खं० 'अणुः' अनु स्थवीयांसम् । उपसर्गः लुप्तनामक- रणः, यथा-'सम्प्रति' । 'कुरुङ्गो' राजा बभूव । कुरु-गमनाद्वा । कुल- गमनाद् वा । 'कुरुः' कृन्ततेः । 'क्रूरम्'-इत्यपि अस्य भवति । 'कुलम्' कुष्णातेः । विकुषितं भवति । 'दूतः' व्याख्यातः । 'जिन्वतिः' प्रीतिकर्मा । “भूमिं पर्जन्या जिन्वन्ति दिवं जिन्वन्त्यग्नयः” [ ऋ० सं० २, ३, २३, ५ ] इत्यपि निगमो भवति ८॥ ( २२ ) ॥ इति षष्ठाध्यायस्य चतुर्थः पादः ।' ६, ४ ॥ “स्थूरं राधः शताश्वं कुरुङ्गस्य दिविष्टिषु । राज्ञ- स्त्वेषस्य सुभगस्य रातिषु तुर्वशेष्वमन्महि । ” ( ऋ० सं० ५, ७, ३३, ४ ) । यह ऋचा मेधातिथि ऋषि की है । बृहती छन्द है । और इसमे दान की प्रशंसा की गई है । अर्थः- ( वयम् ) हम 'तुर्वशेषु' ( मनुष्येषु ) मनुष्यों में 'रातिषु' (दानेषु) दानों के मध्य में 'सुभगस्य' सुभग या सुन्दर ऐश्वर्य वाले या सुहावने 'त्वेषस्य' बड़े 'कुरुङ्गस्य' 'राज्ञः'

हिन्दी निरुक्त ( ३१५ ) ६ अ० ४ पा० ८ खं० कुरुङ्ग राजा के 'दिविष्टेषु' (क्रियासु) यज्ञादि क्रियाओं में 'शताश्वम्' सैकड़ों घोड़ों वाले 'राधः' दक्षिणारूप धन को 'स्थूरम्' (स्थूलम्) मोटा या बहुत 'अमन्महि' (मन्यामहे) मानते हैं। इस प्रकार यहां 'दिविष्टि' शब्द से क्रियाओं का बोध होता है। क्योंकि-यज्ञादि क्रियाओं में ही दान होता है। मेधातिथि इस मन्त्र में कहते हैं कि हम कुरुङ्ग राजा के घोड़ों वाले दान को मनुष्यों में बड़ा दान मानते हैं। घोड़े के दान की विधि दक्षिणा के रूप में पारस्करगृह्य सूत्र में भी वैश्यको विवाह कर्ममें 'वैश्यश्चेदश्वम्' वाक्य से बताई गई है। 'स्थूर' क्या ? समाश्रितमात्र या उस में बहुत मात्रा या परिमाण होता है। अर्थ क्या ? महान् = बड़ा। 'अणु' क्या ? अनु। अर्थात् स्थवीयान् या मोटे को अनु- वर्त्तन करने वाला 'अणु' होता है। प्रयोजन-मोटे का विपरीत 'अणु' होता है। कैसे ? 'अनु' यह उपसर्गमात्र है, इस में इसे नाम बनाने वाला प्रत्यय लुप्त (लोप हुआ हुआ) है, इस से उस का श्रवण नहीं होता है। क्या और भी कोई शब्द ऐसा है, जो केवल उपसर्ग से ही नाम बन गया हो ? है। जैसे- 'सम्प्रति'। यह नाम वर्त्तमान काल का बोधक और 'सम्' 'प्रति' इन दो उपसर्गों से बना हुआ है। इस में कोई प्रत्यय नहीं है। 'कुरुङ्ग' राजा हुआ है। वह कैसे ? वह कुरु देशमें गमन करने से 'कुरुङ्ग' है। क्योंकि वह कुरुओं के प्रति जीतने को गया था। अथवा कुल गमन से 'कुरुङ्ग' है। क्योंकि वह नित्य ही शत्रु कुलों के प्रति जीतने जाता है।

हिन्दी निरुक्त ( ३१६ ) ६ अ० ५ पा० १ खं० 'कुरु' क्यों ? वह शत्रुओं को कृन्तन (छेदन) करता है । 'कृत्' (तु० प०) धातु का है । 'क्रूर' यह भी इसी 'कृत' (तु० प०) धातु का है । 'कुल' 'कुष' (क्रया० प०) धातु से है। क्योंकि वह विस्तृत होने से 'विकुषित' खुला हुआ या बिखरा हुआ जैसा होता है। 'दूत' ( ६६ ) अनवगत ( अ० ५ खं० १ में ) व्याख्यान किया जा चुका है । 'जिन्वति' ( १०० ) धातु प्रीति अर्थ में है। यहां अप्रतीतार्थ होने से पढ़ा गया है । “भूमिं पर्जन्या जिन्वन्ति दिवं जिन्वन्त्यग्नयः ।” अर्थात् पर्जन्य (मेघ) पृथिवी को तृप्त करते हैं और अग्नि दिव् (द्युलोक) को तृप्त करते हैं । यह भी निगम है । इसकी व्याख्या अ० ७ खं० २३ में भी होगी ॥६, ४॥ इति हिन्दीनिरुक्ते षष्ठाध्यायस्य चतुर्थः पादः समाप्तः ॥६,४॥ पञ्चमः पादः । ( सं० १ ) निघ०-अमत्रः ॥ १०१ ॥ ऋन्धीषमः ॥१०२॥ अनर्शरातिम् ॥१०३॥ अनर्वा ॥१०४॥ असामि ॥१०५॥ निरु०-‘अमत्रः’ अमात्रः । महान् भवति । अभ्यमितो वा । “महा अमत्रो वृजने विरप्शी” । ( ऋ० सं० ३, २, १९, ४) । इत्यपि निगमो भवति ।

हिन्दी निरुक्त ( ३१७) ६ अ० ५ पा० १ खं० “स्तवे वज्र्यूचीषमः” [ऋ०सं० ७, ७, ६, २] । स्तूयते वज्री ऋचा समः ॥ ‘अनर्शरातिम्’ अनश्लीलदानम् । अश्लीलं पापकम् । अश्रिमत् विषमम् । “अनर्शरातिं वसुदामुपस्तुहि” [ऋ०सं० ६, ७, ३, ४] इत्यपि निगमो भवति । ‘अनर्वा’ अप्रत्युतः अन्यस्मिन् । “अनर्वाणं वृषभं मन्द्रजिह्वं बृहस्पतिं वर्द्धया नव्यमर्कैः ।” ( ऋ०सं० २, ५, १२, १ ] । ‘अनर्वम्’ अप्रत्युतम् अन्यस्मिन् । वृषभं ‘मन्द्र- जिह्वं’ मन्दनजिह्वं, मोदनजिह्वम्-इति वा । बृह- स्पतिं वर्द्धय नव्यम् । ‘अर्कैः’ अर्चनीयैः स्तोमैः । ‘असामि’ सामिप्रतिषिद्धम् । ‘सामि’ स्यतेः । “असाम्योजो बिभृथा सुदानवः” । [ऋ० सं० १, ३, १९, ५ ] । असुसमाप्तं बलं बिभृत कल्याणदानाः ॥ १ (२३)॥ अर्थः-‘अमत्र’ (१०१) क्या ? अमात्र-जिसकी मात्रा या परिमाण नहो । सो क्या ² महान्-बड़ा होतो है। अथवा अनभ्यमित-जो किसी से हिंसित न होसके, ‘अमत्र’ होता है । “महाँ अमत्रो वृजिने विरप्शी” अर्थात्-महान्

हिन्दी निरुक्त ( ३१८ ) ६ अ० ५, पा० १ खं० बड़ा ‘अमत्रः’ अपरिमित इन्द्रदेव ‘वृजिने’ संग्राममें ‘विरप्शी’ शत्रुओंको रुलाने वाला है । यह भी निगम है । ‘ऋचीषम’ (१०२) यह अनवगत है । यहां ‘ई’ कार का प्रयोजन प्रतीत नहीं होता अथवा इसी के व्यवधान से सारा शब्द अनवगत हो जाता है। ‘ऋचासम’ (ऋचा के समान ) अर्थ में होता है । “स्तवे वज्र्यूचीषमः” अर्थात्—‘ऋचीषमः’ स्तुति में कही हुई ऋचामें जैसी प्रशंसा है, वैसाही होजाने वाला ‘वज्री’ इन्द्रदेव ‘स्तवे’ (स्तूयते) हमसे स्तुति किया जाता है । ‘अनर्शराति’ (१०३) अनवगत अनश्लीलदान—जो पापरूप दान नहीं, अपितु शुद्धदान वाला है, के अर्थ में है । अश्लील नाम पाप या अपवित्र का है। अर्थात्—अश्लील- पापरहित राति-दान जिसका है, सो ‘अनश्लीलराति’ है। ‘अश्लील’ कैसे ? अश्नित् (विषम) शब्द से । “अनर्शरातिं वसुदा मुपस्तुहि” हे स्तुति करने वाले ! ऋत्विज् ! तू ‘अनर्शरातिम्’ पापरहित दान वाले, ‘वसुदाम्’ धनके देनेवाले इन्द्रको ‘उपस्तुहि’ मनसे सोच सोचकर स्तुतिकर । यह भी निगम है । यहां शब्दकी समानता और अर्थ के अविरोध से ‘अनर्शराति’ शब्द ‘अनश्लीलदान’ के अर्थ में है । ‘अनर्वा’ (१०४) अनवगत ‘अप्रत्यृतः’—जो दूसरे में आश्रित नहीं, के अर्थ में है । “अनर्वाणं वृषभं मन्द्रजिह्वं बृहस्पतिं वर्द्धया नव्यमर्कैः” अर्थात्- हे स्तुति करने वाले ! ऋत्विज् ! तू ‘अनर्वाणम्’ दूसरे में आश्रित नहीं, या अपनी महिमा से युक्त

हिन्दी निरुक्त ( ३१६ ) ६ अ० ५ पा० २खं०

'वृषभम्' कामनाओं के बरसने वाले 'मन्द्रजिह्वम् ( मन्दमजि-
ह्वम् ) ( मोदनजिह्वम् ) हर्ष देनेवाली जिह्वा ( शब्द ) वाले
'नव्यम्' स्तुति करने योग्य ' बृहस्पतिम् ' बृहस्पति देव को
'अर्कैः' (अर्चनीयैःस्तौमैः) मन्त्रों से 'वर्द्धय' बढ़ा । इस प्रकार
मन्त्रार्थ के अविरोध से ' अनर्वा ' शब्द ' अप्रत्यृत ' शब्द के
अर्थ में है ।
' असामि ' ( १०५ ) अनवगत 'असमाप्त' के अर्थ में है ।
क्योंकि- ' सामि ' समाप्त का नाम है, और उसी का निषेध
'असामि' शब्द है ।
'सामि' कैसे ? स्यति ( 'सो' दि० प० ) धातु का है ।
'असाम्योजो बिभृथा सुदानवः' अर्थात् 'सुदानवः!'
हे कल्याण दान वाले ! मरुतो ! तुम सब 'असामि' ( असुस-
माप्तम् ) नहीं समाप्त होने वाले 'ओजः' ( बलम् ) बल को
'बिभृथ' ( बिभृत ) धारण करो । इस प्रकार यहां अर्थ के
अविरोध से 'असामि' शब्द 'असुसमाप्त' शब्द के अर्थ में है
॥ १ ( २३ ) ॥
( खं० २ )
निघ०-गल्दया ॥१०६॥
निरु०—“मात्वा सोमस्य गल्दया सदा याच-
न्नहंगिरा । भूर्णिं मृगं न सवनेषु चुक्रुधं कईशानं
न याचिषत् ॥” [ऋ० सं० ५,७,१३,५] ।
मा चुक्रुधं त्वां सोमस्य गालनेन सदा याचन्नहं
गिरा गीत्या स्तुत्या, भूर्णिमिव मृगं न सवनेषु

हिन्दी निरुक्त ( ३२०) ६ अ० ५ पा० २ खं० चुक्रुधं, क ईशानं न याचिष्यते-इति । 'गल्दा' धमनयो भवन्ति । गलन मासुधीयते । “ आत्वां विशन्त्विन्दव आगल्दा धमनी- नाम् । ” नानाविभक्ती त्वेते भवतः । आगलना धमनी- नाम्-इत्यत्रार्थः ॥ २ ( २४ ) ॥ 'गल्द्या' (१ ६) यह अनवगत है । 'गल्दा' क्या ? 'गलितधानी'— जिसमें गलित या गला हुआ ( अन्न आदि ) धारण किया जाता है । वह क्या ? नाड़ी । “मात्वा सोमस्य”इस ऋचा का मेधातिथि ऋषि, इन्द्र देवता, बृहती छन्द और महाव्रत में बृहती सहस्र में विनियोग है । अर्थः-हे इन्द्र ! 'अहम्' मैं 'सधनेषु' यज्ञोंमें 'गिरा' (गीत्या- स्तुत्या ) स्तुतिसे 'सदा' सब काल में 'याचन्' याचना हुआ 'सोमस्य' सोमके 'गल्दया' ( गालनेन-धमनेन-पूरणेन ) भरने से 'त्वा' ( त्वाम् ) तुझे 'मा' 'चुक्रुधम्' ( मा क्रोधयेयम् ) क्रोध न दिलाऊँ । और किस प्रकार क्रोधित न करूं ? 'भूर्णिं मृगं न ' भ्रमण-शील-घूमते हुए मृग-व्याघ्र-सिंह को जैसे । अर्थात् गीदड़ आदि छोटे वनचर जिस प्रकार पूंछ हिलाकर सिंह को फुसलाते हुए उसे क्रोधित नहीं करते, उसी प्रकार सोमके दान सहित स्तुतिसे तुम्हारे पास आता हुआ मैं तुझे क्रोध नहीं दिलाता । यदि मेरे क्रोध से तू डरता है, तो मुझसे याचना मतकर ? “ कईशानं न याचिष्यते ” कौन ऐसा संसार में है, जो ईश्वर से याचना न करेगा। क्योंकि जो मांगते नहीं, उनकी वृत्ति–जीविका सिद्ध नहीं होती । इस प्रकार

हिन्दी निरुक्त ( ३२१ ) ६ अ० ५ पा० ३ खं० यहां इन्द्रकी जो गले की नाड़ी है, जिससे कि-सोम निगला जाता है, वह नाडी आगलन-निगलने से उपलक्षित होती हुई 'गल्दा' कही जाती है। क्योंकि-ऐसे ही अर्थ की उप- पत्ति होती है। 'गल्दा' धमनी या नाडी होती हैं। क्योंकि-इनमें गलन निगलना धारण किया जाता है। “मात्वा”इस पूर्वोक्त मन्त्र में 'गल्दा' शब्द के धमनि-नाडी वाचक होने में कोई विशेष लिङ्ग नहीं है, इसी से भाष्यकार दूसरा उदाहरण देते हैं- “आ त्वा विशन्त्विन्दव आगल्दा धमनीनाम्” अर्थात्-हे इन्द्र ! 'इन्दवः' (सोमाः) सोम 'त्वा' (त्वाम्) तुझे 'आविशन्तु' प्रवेश करें। और किस प्रकार ? 'आगल्दा- धमनीनाम्' जिन अधोवाहिनी-नीचे को लेजाने वाली नाडि- यों से निगले हुए सोम नए मद को उत्पन्न करते हैं, उन धमनियों नाड़ियों से प्रवेश करें। इस प्रकार यहां 'धमनी' शब्द के साथ लगा हुआ 'गल्दा' शब्द है, इससे 'आगल्दा' धमनी है, यह सिद्ध होता है। 'गल्दया' और 'गल्दाः' ये दोनों पद भिन्न विभक्तिवाले ही हैं, जैसे कि पहिले में तृतीया विभक्ति का एक वचन है, और दूसरे पद में प्रथमा का बहुवचन, किन्तु इनके अर्थ में भेद नहीं है। पूर्व मन्त्र में 'गल्दा' शब्द के साथ 'धमनी' शब्द नहीं था, और दूसरे मन्त्र में है, यही दोनों उदाहरणों में परस्पर भेद है ॥ २ (२४) ॥ (खं० ३) निघ०-जल्हवः ॥१०७॥ निरु०-“न पापासो मनामहे नारायासो न ४१

हिन्दी निरुक्त ( ३२२ ) ६ अ० ५ पा० ४ खं० जल्हवः ।” (ऋ०सं०६,४,३७,६) न पापा मन्यामहे, नाधनाः, नज्वलनेन हीनाः। अस्ति अस्मासु ब्रह्मचर्यम्-अध्ययनं-तपः-दानकर्म, इति ऋषिः-अवोचत् ॥३ (२५)॥ 'जल्हवः' (१०७) यह अनवगत 'ज्वलन-हीनाः' (अग्नि से रहित) के अर्थ में है। अर्थः- “न पापासो मनामहे नारायासो न जल्हवः” अर्थात्-हे इन्द्र ! 'न पापासो (पापाः) मनामहे' (मन्यामहे) हम अपने को पापी नहीं मानते हैं। क्योंकि= हम 'न-अरायासः' (न अधनाः) निर्धन नहीं हैं, 'न जल्हवः' (न ज्वलनेन हीनाः) और अग्निसे रहित नहीं हैं। किन्तु जो निष्पापता के कारण हैं, वे सब ब्रह्मचर्य अध्ययन-वेद का पढना, तप-क्लेश सहने का सामर्थ्य, दान-कर्म, हम में हैं,- यह ऋषि ने कहा। यहां 'जल्हवः' शब्द शब्द की समानता और अर्थ के अविरोध से 'ज्वलनहीनाः' (अग्नि से रहित) के अर्थ में है ॥ ३ ( २५ ) ॥ ( खं० ४ ) निघ०--बकुरः॥१०८॥ बेकनाटान्॥१०९॥ निरु०—'बकुरः' भास्करः । भयङ्करः । भास- मानो द्रवति-इतिवा ॥ “यवं वृकेणाश्विना वपन्तेषं दुहन्ता मनुषाय दस्रा । अभिदस्युं बकुरेणाधमन्तोरुज्योतिश्चक्रथु-

हिन्दी निरुक्त ( ३२३ ) ६ अ० ५ पा० ४ खं० शार्याय ॥" (ऋ० सं० १,८,१७,१) ॥ यवमिव वृकेण अश्विनौ निवपन्तौ । 'वृको' लाङ्गलं भवति । विकर्त्तनात् । 'लाङ्गलं' लङ्गतेः । लांगूलवद्वा । 'लांगूलं' लगतेः । लङ्गतेः । लम्बतेर्वा । अन्नं दुहन्तौ मनुष्याय दर्शनीयौ अभिधमन्तौ । 'बकुरेण' ज्योतिषा वा । उदकेन वा । 'आयेः' ईश्वरपुत्रः ॥ 'बेकनाटाः' खलु कुसीदिनो भवन्ति । द्विगुण- कारिणो वा । द्विगुणदायिनो वा । द्विगुणं काम- यन्तः-इतिवा । “इन्द्रो विश्वान्वेक्नाटाँ अहर्दृश उत क्रत्वा पर्णी रभि ।” (ऋ०सं०६,४,४९,५) । इन्द्रो यः सर्वान् बेकनाटान् अहर्दृशः सूर्यदृशः । ये इमानि अहानि पश्यन्ति न पराणि-इतिवा । अभिभवति कर्मणा, पर्णीश्च वणिजः ॥४(२६)॥ अर्थः-'बकुरः' (१०८) यह अनवगत है । भास्करः (प्रकाश करने वाला) 'भयङ्करः' (भय देनेवाला) अथवा 'भास्वद् द्रवणः' (चमकता हुआ चलने वाला) ये शब्दसमाधियें हैं । यवं वृकेण०—० चक्रथुरायाय ।" अर्थात्-