भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 725

हिन्दी निरुक्त (३१२) ६ अ० ४ पा० ७ खं० है,-यह है। दोनों में 'कु' (अदा० प०) मूल धातु है, और वही 'यङ्' प्रत्यय के योग से 'चोष्कूय' के रूप में संयुक्त धातु हो गया है, उसी के ये नाम और आख्यात नाम वाले दो रूप बने हैं। प्रथम का उदाहरण— “चोष्कूयमाण इन्द्र भूरि वामम्” अर्थात्- 'इन्द्र' ! हे इन्द्र ! 'भूरि' (बहु) बहुत 'वामम्' (वननीयम्) वाञ्छनीय जल को 'चोष्कूयमाणः' (ददत्) देता हुआ (“मा पणिर्भूः”) बनिये के समान कृपण (सूंजी) मत हो। इस प्रकार यहां 'वणिक के समान मत हो' 'बहुत वाञ्छनीय' इन पदों के सम्बन्ध से 'चोष्कूयमाणः' पद 'ददत्' (देताहुआ) के अर्थ में है। दूसरे अर्थ का उदाहरण— “एधमान द्विलुभयस्य राजा चोष्कूयते विश इन्द्रो मनुष्यान्” अर्थात्-‘इन्द्रः’ इन्द्रदेव 'एधमान द्विट्' (एधमानान् अपि असुन्वतः द्वेष्टि) बढते हुओं (सम्पत्ति- मानों) को भी जो सोम का सवन नहीं करते-उसकी आज्ञा में नहीं चलते, द्वेष करता है। और (सुन्वतः अभ्यादधाति) सवन करने वालों या आज्ञामें चलने वालों को ऊँचा करता है, या अभ्युदयसे संयुक्त करता है। 'उभयस्य राजा' (दिव्यस्य च पार्थिवस्य च राजा) द्युलोक के धनका और पृथिवी के धन का राजा (स्वामी) है। और 'विशः' बढते हुए नहीं यजन करनेवाले मनुष्यों को 'चोष्कूयते' (व्युदस्यति) अभ्युदयसे हटाता है, एवम् 'मनुष्यान्' अपने को पूजने वाले मनुष्यों को उन्नत करता है। इस प्रकार यहां 'चोष्कूयते' पद 'व्युदस्यति' (हटाता है-गिराता है-दण्डित करता है) के अर्थ में है। क्योंकि-'एधमानद्विट् (बढते हुओं से द्वेष करने वा) शब्द से