निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३११ ) दै० अ० ४ पा० ७ खं० “हिनोतानो” यह ऋचा कवष ऋषि की है। अपोनप्त्रीय ऋचाओं में शस्त्र है। अर्थः- हे (ऋत्विजः !) ऋत्विजो ! 'देवयज्या' (देव- यज्यायै) देवताओंके यजनके अर्थ 'अध्वरम्' यज्ञ को 'हिनो- त' (प्रहिणुत) प्रेरितकरो (भले प्रकार चलाओ) । और हमें 'धनानाम्' धनोंकी 'सनये' (सधनाय = लब्धये) प्राप्ति के लिये (यूयम्) तुम सब 'ब्रह्म' स्तुतिरूप वेद को 'हिनोत' (प्रहिणुत) प्रेरित करो (उच्चारण करो) । 'ऋतस्य योगे' (यज्ञस्य योगे अथवा याज्ञे शकटे) और यज्ञ के संयोग में अथवा यज्ञ-सम्बन्धि शकट में जो 'ऊधः' ओंढी के समान अधिपवण-चर्म (सोमरस घालने के लिये ग्रह चमस, और स्थाली आदि पात्रोंके नीचे बिछाया जाने वाला चर्म) को 'विष्यध्वम्' छोड़ दो। इस प्रकार ऋत्विजों से कहकर सोमसे मिले हुए जलों से कहता है- 'आपः !' हे जलो ! (जलसमूह !) तुम 'अस्मभ्यम्' हमारे लिए 'शृणीवरीः' (सुखवत्यः) सुख देने वाली 'भूतन' (भवत) होओ । 'शकट' क्यों ? शकृदित या गोबर से सना हुआ जैसा होता है। क्योंकि-जब उसमें जुताहुआ बैल गोबर करता है, तब उस गोबर से वह शकट या गाड़ा भी लिप्त हो जाता है। अथवा- 'शनकैः-तकति' बोझसे दबा हुआ धीरे धीरे चलता है। अथवा-'शब्देन तकति' शब्द करता हुआ चलता है, इससे 'शकट' है । 'चोष्कूयमाणः' (६५) और 'चोष्कूयते' (९६) ये दो अनवगत हैं। इनमें धातु ही अप्रतीत है। इन दोनों में पहिला सुबन्त (नाम) और दूसरा तिङन्त (आख्यात) है। पहिले का अर्थ 'देता हुआ, और दूसरे का अर्थ 'हटाता