निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 721, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३०८ ) ६ अ० ४ पा० ६ खं० “रास्पिनस्यायोः” अर्थात् 'रास्पिनस्य' शब्द करने वाले या स्तुति करने वाले 'आयोः' जल की या पुत्र की प्राप्ति के अर्थ ( हे ऋत्विजो ! ऐसा करो ।) यह भी निगम होता है । इस प्रकार यहां 'रास्पिन' शब्द से जल अथवा स्तोता कहा गया है । 'ऋञ्जति' ( ६१ ) यह धातु प्रसाधन या किसी को अपने अनुकूल बनाने अर्थ में है । भगवद्दुर्गाचार्य कहते हैं कि इस शब्द को 'भाऋञ्जीक' शब्द के समान समझ कर भाष्यकार ने इस का निगम नहीं पढा । इस से जान पड़ता है—मुद्रित पुस्तकों में यहां पर “आवऋञ्जसे ऊर्जा व्युष्टिषु” यह जो निगम दिया हुआ है, वह पीछे से निविष्ट किया हुआ है, या उक्त आ- चार्य के समीपस्थ पुस्तकों में न था । इस उद्धृत खण्ड का अब तक पता भी नहीं चला है कि यह कहां का है । 'ऋजु' ( ६२ ) यह भी इस 'ऋञ्ज' ( भ्वा० प० ) धातु का ही है । “ऋजुनीती नो वरुणः ( मित्रो नयतु विद्वान् । अर्यमा देवैः सजोषाः ॥”) (ऋ० सं० १, ६, १७, १, ) ॥ अर्थात्–'ऋजुनीती' सरलनीति वाला या सरलबुद्धि वाला 'वरुणः'वरुणदेव 'विद्वान्' विद्वान् 'मित्रः' मित्रदेव और 'अर्यमा' अर्यमा देव 'देवैः' देवताओं के साथ 'सजोषाः' प्रसन्न होता हुआ 'नः' हम को 'नयतु' इस लोक से परलोक में ले जावे । यहां ऋजु शब्द शब्द की समानता से 'ऋञ्ज' धातु से ही है, अर्थ इस का प्रसिद्ध अथवा सरल हो सकता है ।