निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३०६ ) ६ अ० ४ पा० ७ खं० 'प्रतद्वसू' ( ६३ ) यह अनवगत 'प्राप्तवसू' ( जिन्होंने धन को प्राप्त कर लिया हो ऐसे दो ) के अर्थ में है । 'अश्वौ' ( दो घोड़े ) अर्थ है । “हरी इन्द्र प्रतद्वसू अभिस्वर” अर्थात्-'इन्द्र' हे इन्द्र ! देव ! तेरे 'हरी' दोनों घोड़े 'प्रतद्वसू' अपने ऋजीष ( सोम के खखस या धान रूप धन को यज्ञ में प्राप्त हो गये हैं, इस से तू 'अभि स्वर' हमारी ओर आ । यह भी निगम है । इस प्रकार यहां 'हरी' इस पद के संबन्ध से 'प्रतद्वसू' यह शब्द 'प्राप्तवसू' ( प्राप्त धन ) के अर्थ में उपपन्न होता है ॥ ५ (२१) ॥ ( खं० ७ ) निघ०-हिनोत ॥९४॥ चोष्कूयमाणः ॥ ९५॥ चोष्कूयते ॥ ९६ ॥ सुमतू ॥ ९७ ॥ दिविष्टिषु ॥ ९८ ॥ निरु०-“हिनोता नो अध्वरं देवयज्या हिनोत ब्रह्म सनये धनानाम् । ऋतस्य योगे विष्यध्वमूर्धः श्रुष्टीवरी भूतनास्मभ्यमापः ॥” ( ऋ० सं० ७, ७, २६, १ ) ॥ प्रहिणुत नोऽध्वरं देवयज्यायै । प्रहिणुत ब्रह्म धनस्य सवनाय । ऋतस्य योगे यज्ञस्य योगे याज्जे शकटे इतिवा । 'शकटं' शक्रदितं भवति। शनकैस्तर्कति-इतिवा ।