निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३४७ ) ६ अ० ४ पा० ६ खं० त्वष्टा देवता, अनुष्टुप् छन्द, है, और यह ऋचा आप्री सूक्त में है, अर्थात्- उसी के विनियोग में इस का विनियोग है, स्वतन्त्र नहीं । 'नाभानः' ( न-अभानः = सदा दीप्यमानः ) सदा चमक- ने वाला 'अस्मयुः' हमारे ऊपर अनुग्रह करने की कामना करता हुआ 'त्वष्टा' त्वष्टा देव 'राये' ( रायः = धनस्य ) धन के 'पोषाय' पोषण के लिये 'तत्' वह 'तुरीपम्' ( तूर्णापि ) जलं 'विष्यतु' बरसे या बरसावे ( यत् ) जो 'अद्भुतम्' ( महत् संभूतम् ) बहुत ही उत्तम 'पुरुत्मना' ( आत्मना ) (बह्वात्म- ना) अनेकरूपसे 'पुरुवारम्' देशान्तर में आवरण करने (छाजाने) वाला हो । यहां 'त्वष्टा' मध्यम लोकके देवता और 'विष्यतु' ( वर्षतु ) के सम्बन्धसे 'तुरीप' जल है, यह उपपन्न होता है । इस मन्त्र में उत्तम जलकी अपेक्षा दिखलाई है । जितना ही उत्तम जल बरसेगा उतना ही आरोग्य और आयुः-वृद्धि आदि का कारण होगा । क्योंकि-जलसे ही ओषधि वनस्पति आदि सब जीवन साधन होते हैं, उनमें जलके ही अनुसार बल नीरोगता आदि गुण होते हैं, तथा स्वयम् जल पान में उपयुक्त होकर उदर में अपनी उत्तमता के अनुसार लाभ देता है । ४ अस्मयुः ' यहां ' * अस्मान् कामयमानः ' हमें चाहने वाला ॥ 'रास्पिन' (६७) क्या ? 'रास्पी' शब्द करने वाला (जल) अथवा स्तुति करने वाला ( पुत्र ) । कैसे ? शब्दार्थक ' रप ' (भ्वा० प०) धातु से अथवा शब्दार्थक ही ' रस ' (भ्वा०प०) धातु से !