निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३२२ ) ६ अ० ५ पा० ४ खं० जल्हवः ।” (ऋ०सं०६,४,३७,६) न पापा मन्यामहे, नाधनाः, नज्वलनेन हीनाः। अस्ति अस्मासु ब्रह्मचर्यम्-अध्ययनं-तपः-दानकर्म, इति ऋषिः-अवोचत् ॥३ (२५)॥ 'जल्हवः' (१०७) यह अनवगत 'ज्वलन-हीनाः' (अग्नि से रहित) के अर्थ में है। अर्थः- “न पापासो मनामहे नारायासो न जल्हवः” अर्थात्-हे इन्द्र ! 'न पापासो (पापाः) मनामहे' (मन्यामहे) हम अपने को पापी नहीं मानते हैं। क्योंकि= हम 'न-अरायासः' (न अधनाः) निर्धन नहीं हैं, 'न जल्हवः' (न ज्वलनेन हीनाः) और अग्निसे रहित नहीं हैं। किन्तु जो निष्पापता के कारण हैं, वे सब ब्रह्मचर्य अध्ययन-वेद का पढना, तप-क्लेश सहने का सामर्थ्य, दान-कर्म, हम में हैं,- यह ऋषि ने कहा। यहां 'जल्हवः' शब्द शब्द की समानता और अर्थ के अविरोध से 'ज्वलनहीनाः' (अग्नि से रहित) के अर्थ में है ॥ ३ ( २५ ) ॥ ( खं० ४ ) निघ०--बकुरः॥१०८॥ बेकनाटान्॥१०९॥ निरु०—'बकुरः' भास्करः । भयङ्करः । भास- मानो द्रवति-इतिवा ॥ “यवं वृकेणाश्विना वपन्तेषं दुहन्ता मनुषाय दस्रा । अभिदस्युं बकुरेणाधमन्तोरुज्योतिश्चक्रथु-