निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३२१ ) ६ अ० ५ पा० ३ खं० यहां इन्द्रकी जो गले की नाड़ी है, जिससे कि-सोम निगला जाता है, वह नाडी आगलन-निगलने से उपलक्षित होती हुई 'गल्दा' कही जाती है। क्योंकि-ऐसे ही अर्थ की उप- पत्ति होती है। 'गल्दा' धमनी या नाडी होती हैं। क्योंकि-इनमें गलन निगलना धारण किया जाता है। “मात्वा”इस पूर्वोक्त मन्त्र में 'गल्दा' शब्द के धमनि-नाडी वाचक होने में कोई विशेष लिङ्ग नहीं है, इसी से भाष्यकार दूसरा उदाहरण देते हैं- “आ त्वा विशन्त्विन्दव आगल्दा धमनीनाम्” अर्थात्-हे इन्द्र ! 'इन्दवः' (सोमाः) सोम 'त्वा' (त्वाम्) तुझे 'आविशन्तु' प्रवेश करें। और किस प्रकार ? 'आगल्दा- धमनीनाम्' जिन अधोवाहिनी-नीचे को लेजाने वाली नाडि- यों से निगले हुए सोम नए मद को उत्पन्न करते हैं, उन धमनियों नाड़ियों से प्रवेश करें। इस प्रकार यहां 'धमनी' शब्द के साथ लगा हुआ 'गल्दा' शब्द है, इससे 'आगल्दा' धमनी है, यह सिद्ध होता है। 'गल्दया' और 'गल्दाः' ये दोनों पद भिन्न विभक्तिवाले ही हैं, जैसे कि पहिले में तृतीया विभक्ति का एक वचन है, और दूसरे पद में प्रथमा का बहुवचन, किन्तु इनके अर्थ में भेद नहीं है। पूर्व मन्त्र में 'गल्दा' शब्द के साथ 'धमनी' शब्द नहीं था, और दूसरे मन्त्र में है, यही दोनों उदाहरणों में परस्पर भेद है ॥ २ (२४) ॥ (खं० ३) निघ०-जल्हवः ॥१०७॥ निरु०-“न पापासो मनामहे नारायासो न ४१