निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३२०) ६ अ० ५ पा० २ खं० चुक्रुधं, क ईशानं न याचिष्यते-इति । 'गल्दा' धमनयो भवन्ति । गलन मासुधीयते । “ आत्वां विशन्त्विन्दव आगल्दा धमनी- नाम् । ” नानाविभक्ती त्वेते भवतः । आगलना धमनी- नाम्-इत्यत्रार्थः ॥ २ ( २४ ) ॥ 'गल्द्या' (१ ६) यह अनवगत है । 'गल्दा' क्या ? 'गलितधानी'— जिसमें गलित या गला हुआ ( अन्न आदि ) धारण किया जाता है । वह क्या ? नाड़ी । “मात्वा सोमस्य”इस ऋचा का मेधातिथि ऋषि, इन्द्र देवता, बृहती छन्द और महाव्रत में बृहती सहस्र में विनियोग है । अर्थः-हे इन्द्र ! 'अहम्' मैं 'सधनेषु' यज्ञोंमें 'गिरा' (गीत्या- स्तुत्या ) स्तुतिसे 'सदा' सब काल में 'याचन्' याचना हुआ 'सोमस्य' सोमके 'गल्दया' ( गालनेन-धमनेन-पूरणेन ) भरने से 'त्वा' ( त्वाम् ) तुझे 'मा' 'चुक्रुधम्' ( मा क्रोधयेयम् ) क्रोध न दिलाऊँ । और किस प्रकार क्रोधित न करूं ? 'भूर्णिं मृगं न ' भ्रमण-शील-घूमते हुए मृग-व्याघ्र-सिंह को जैसे । अर्थात् गीदड़ आदि छोटे वनचर जिस प्रकार पूंछ हिलाकर सिंह को फुसलाते हुए उसे क्रोधित नहीं करते, उसी प्रकार सोमके दान सहित स्तुतिसे तुम्हारे पास आता हुआ मैं तुझे क्रोध नहीं दिलाता । यदि मेरे क्रोध से तू डरता है, तो मुझसे याचना मतकर ? “ कईशानं न याचिष्यते ” कौन ऐसा संसार में है, जो ईश्वर से याचना न करेगा। क्योंकि जो मांगते नहीं, उनकी वृत्ति–जीविका सिद्ध नहीं होती । इस प्रकार