भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 732, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 732

हिन्दी निरुक्त ( ३१६ ) ६ अ० ५ पा० २खं०

'वृषभम्' कामनाओं के बरसने वाले 'मन्द्रजिह्वम् ( मन्दमजि-
ह्वम् ) ( मोदनजिह्वम् ) हर्ष देनेवाली जिह्वा ( शब्द ) वाले
'नव्यम्' स्तुति करने योग्य ' बृहस्पतिम् ' बृहस्पति देव को
'अर्कैः' (अर्चनीयैःस्तौमैः) मन्त्रों से 'वर्द्धय' बढ़ा । इस प्रकार
मन्त्रार्थ के अविरोध से ' अनर्वा ' शब्द ' अप्रत्यृत ' शब्द के
अर्थ में है ।
' असामि ' ( १०५ ) अनवगत 'असमाप्त' के अर्थ में है ।
क्योंकि- ' सामि ' समाप्त का नाम है, और उसी का निषेध
'असामि' शब्द है ।
'सामि' कैसे ? स्यति ( 'सो' दि० प० ) धातु का है ।
'असाम्योजो बिभृथा सुदानवः' अर्थात् 'सुदानवः!'
हे कल्याण दान वाले ! मरुतो ! तुम सब 'असामि' ( असुस-
माप्तम् ) नहीं समाप्त होने वाले 'ओजः' ( बलम् ) बल को
'बिभृथ' ( बिभृत ) धारण करो । इस प्रकार यहां अर्थ के
अविरोध से 'असामि' शब्द 'असुसमाप्त' शब्द के अर्थ में है
॥ १ ( २३ ) ॥
( खं० २ )
निघ०-गल्दया ॥१०६॥
निरु०—“मात्वा सोमस्य गल्दया सदा याच-
न्नहंगिरा । भूर्णिं मृगं न सवनेषु चुक्रुधं कईशानं
न याचिषत् ॥” [ऋ० सं० ५,७,१३,५] ।
मा चुक्रुधं त्वां सोमस्य गालनेन सदा याचन्नहं
गिरा गीत्या स्तुत्या, भूर्णिमिव मृगं न सवनेषु
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