निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३१८ ) ६ अ० ५, पा० १ खं० बड़ा ‘अमत्रः’ अपरिमित इन्द्रदेव ‘वृजिने’ संग्राममें ‘विरप्शी’ शत्रुओंको रुलाने वाला है । यह भी निगम है । ‘ऋचीषम’ (१०२) यह अनवगत है । यहां ‘ई’ कार का प्रयोजन प्रतीत नहीं होता अथवा इसी के व्यवधान से सारा शब्द अनवगत हो जाता है। ‘ऋचासम’ (ऋचा के समान ) अर्थ में होता है । “स्तवे वज्र्यूचीषमः” अर्थात्—‘ऋचीषमः’ स्तुति में कही हुई ऋचामें जैसी प्रशंसा है, वैसाही होजाने वाला ‘वज्री’ इन्द्रदेव ‘स्तवे’ (स्तूयते) हमसे स्तुति किया जाता है । ‘अनर्शराति’ (१०३) अनवगत अनश्लीलदान—जो पापरूप दान नहीं, अपितु शुद्धदान वाला है, के अर्थ में है । अश्लील नाम पाप या अपवित्र का है। अर्थात्—अश्लील- पापरहित राति-दान जिसका है, सो ‘अनश्लीलराति’ है। ‘अश्लील’ कैसे ? अश्नित् (विषम) शब्द से । “अनर्शरातिं वसुदा मुपस्तुहि” हे स्तुति करने वाले ! ऋत्विज् ! तू ‘अनर्शरातिम्’ पापरहित दान वाले, ‘वसुदाम्’ धनके देनेवाले इन्द्रको ‘उपस्तुहि’ मनसे सोच सोचकर स्तुतिकर । यह भी निगम है । यहां शब्दकी समानता और अर्थ के अविरोध से ‘अनर्शराति’ शब्द ‘अनश्लीलदान’ के अर्थ में है । ‘अनर्वा’ (१०४) अनवगत ‘अप्रत्यृतः’—जो दूसरे में आश्रित नहीं, के अर्थ में है । “अनर्वाणं वृषभं मन्द्रजिह्वं बृहस्पतिं वर्द्धया नव्यमर्कैः” अर्थात्- हे स्तुति करने वाले ! ऋत्विज् ! तू ‘अनर्वाणम्’ दूसरे में आश्रित नहीं, या अपनी महिमा से युक्त