निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । ७१ कर । और 'माहार्षीः' = मत लेजा । और 'खलु' यह [ प्रतिषेध अर्थमें ] । [ जैसे-] 'खलु कृत्वा' = न करके । 'खलु कृतम्' = नहीं किया । और पद-पूरण अर्थमे भी । 'एवं खलु तद् बभूव' = ऐसे वह हुआ । 'शश्वत्'—यह संशय अर्थमें लोकमे आता है । [ वेदमे अन्य अन्य अर्थोमे भी यथा-संभव देखना चाहिये-] 'शश्वदेवम् = ऐसे ? । यह दोबारा प्रश्नमें । 'एवं शश्वत् ? = यह विना अपने पूछे । 'नूनम्'—यह संशय अर्थमें लोकमें । वेदमें दोनो अर्थोमें । संशय अर्थमें, और पदपूरण अर्थमें । [ उदाहरण की भूमिका ] अगस्त्यने इन्द्रके लिये हवि निर्वाप या घाल कर दूसरे देवताको देना विचारा, उस इन्द्रने आकर क्रोधपूर्वक विलाप किया । इति द्वितीयः पादः । ―――― तृतीय पाद । ( खं०-१ ) “न नूनमस्ति नो श्वः कस्तद्वेद यदद्भुतम् । अन्यस्य चित्तमभि संचरेण्यमुताधीतं विनश्यति ॥ न नूनमस्ति अद्यतनम्, नो एव श्वस्तनम् । 'अद्य' अस्मिन्द्यवि । 'द्युः' इति अन्हो नामधेयम्, द्योतते इति सत्ः । 'श्वः' उपाशंसनीयः कालः । 'ह्य' हीनः कालः । “कस्तद्वेद यदद्भुतम्” । कस्तद्वेद यदभूतम् । इदमपि इतरत् 'अद्भुतम्'—अभूतमिव ।