निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त। ७५ “प्रसीमादित्यो असृजत्” [ऋ० सं० २, ७, ६, ४] [‘सीम’ के अनर्थक पक्षमें-] सूर्यने अपनी किरणोंको फैलाया। [परिग्रह अर्थमे] सब ओरसे फैलाया। [और जैसे] “विसीमतः सुरुचो वेन आवः” [य० वा० सं० १३, ३] [सा० सं० ४, ३, ६] मेधावी [आदित्यने] अच्छे प्रकाशवाली किरणोंको सब ओर फैलाया। फैलाया सब ओरसे आदित्यने] 'सुरुच्' नाम आदित्यकी किरणोंका है, क्योंकि वे अच्छा प्रकाश फैलाती है। अथवा जो अनर्थक लगा हुआ 'सीम्' के रूपमे कहा गया है, वह सन्धिके भेदसे 'सीम' शब्द मानना चाहिये और उसके आगे 'तः' यह प्रत्यय पंचमी विभक्तिका अर्थ देता है। [जिससे] सीमसे, सीमासे, मर्यादासे [अर्थ होता है] 'सीमा' नाम मर्यादाका है। क्योंकि वह दो देशोंको अलग करती है। 'त्व' यह विनिग्रह अर्थ मे सर्व- नाम और अनुदात्त। आधेका नाम है,—ऐसा कोई मानते हैं॥२॥ “ऋचामुत्वः पोषमास्ते पुपुष्वान् गायत्रन्त्वो गायति शक्वरीषु । ब्रह्मा त्वो वदति जातविद्यां यज्ञस्य मात्रां विमिमीत उत त्वः” ॥ इति ऋत्वि- क्कर्मणां विनियोगमाचष्टे । ऋचामेकः पोषमास्ते पुपुष्वान् होता । ऋक् = अर्चनी । गायत्रमेको गायति शक्वरोषु उद्गाता । गायत्रं गायतै स्तुति- कर्मणः । “शक्वर्यः ऋचः शक्नोतेः । तद् यदाभि वृत्रमशकदद्धन्तुं तत् शक्करीणां शक्करीत्वम्”