भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 760, कुल 1282 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 760

हिन्दी निरुक्त ( ३४७ ) ६ अ० ६ पा० ४ खं० 'आणिः' अरणात् । तन्नो मघवञ्रन्धय इति । रध्यति र्वशगमने ॥ 'बुन्दः' इषुुर्भवति । बुन्दो वा । भिन्दो वा । भयदो वा । भासमानो द्रवति इति वा ॥४(३२)॥ अर्थः-'कीकटाः' (१५७) यह अनवगत है । 'किंकृताः' अथवा 'किं-क्रियाभिः' ये इसकी शब्द समाधियें हैं । इस का वाच्य अर्थ अनार्यों का म्लेच्छों का निवास देश है । “किं ते कृण्वन्ति” इस ऋचा का विश्वामित्र ऋषि, इन्द्र देवता और त्रिष्टुप् छन्द है । हे इन्द्रदेव ! (याः) जो 'कीकटेषु' (अनार्यदेशनिवासिषु मनुष्येषु) म्लेच्छ देश के रहने वाले मनुष्यों में या म्लेच्छों के देश में 'गावः' गौयें हैं, (ताः) वे 'ते' तेरा 'किम्' क्या 'कृण्व- न्ति' (कुर्वन्ति) करती हैं ? [ कुछ नहीं ] क्यों? “न आशि- रं दुहे” न आशिर [सोममें मिलाने योग्य दूध] देती हैं, और “न तपन्ति घर्मम्” न घर्म [महावीर पात्र] को अपने दूध से तपाती हैं। [प्रयोजन यह कि-और भी अग्निहोत्रादि कर्मों में वे उपयुक्त नहीं होतीं ।] इस से हम कहते हैं— “आभर (हर) नः (ताः गाः)” लेआ उन गौओंको हमारे पास [क्योंकि-हमउन गौओंसे आशिर आदि हविः तैयार करके तुम्हारा उपकार करेंगे ।] और “प्रमगन्दस्य वेदः” जो यह प्रमगन्द-अत्यन्त ही ब्याज खाने वाले पुरुष का धन है, सो भी 'आभर' लेआ । [क्योंकि-वह भी तेरे यजन में नहीं लगता ।] और “नैचाशाखं मघवन् ! रन्धय नः'