निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 762, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३४६ ) ६ अ० ६ पा० ४ खं० 'प्रमगन्द' क्या ? 'मगन्द' कुसीदी-व्याज लेने वाला वा- णियाँ । 'मगन्द' क्या ? ' मागन्द ' । ' मागन्द ' ही क्या ? “माम्-आगमिष्यति” मेरे पास आवेगा, इस हेतु वह अपना धन दूसरे को दे देता है । उस (मगन्द) का अपत्य-पुत्र 'प्रमगन्द' होता है । वह कौन 'अत्यन्तकुसीदिकुलीन ' बहुत ही बहुत व्याज खाने वाले के कुल में जन्मने वाला । प्रयोजन यह कि-'माम्-आ-गम्-दा' इन चार शब्दों का संक्षेपरूप 'मा- गन्द' शब्द हुआ । ( १ ) 'माम्' या 'मा' ( मुझको ) 'अस्मद्' शब्दके द्वितीया के एक वचन का रूप है । (२) 'आ' (आङ्) उपसर्ग ( आ अर्थमें ) है । (३) 'गम्' (भ्वा०प०) ( जाना अर्थ में ) धातु है । और (४) 'दा' ( दान अर्थ में ) (जु०उ०) धातु है । 'मागन्द' का संक्षेप-छोटा रूप ' मगन्द ' हुआ । और ' मगन्द ' तथा 'प्र' इन दोनों के योग से ' प्रमगन्द ' हुआ । 'मगन्द' का अर्थ कुसीदी ( व्याजडिया ) है, और 'प्र' का अर्थ अपत्य या पुत्र है । मिलकर 'कुसीदी का पुत्र' अर्थ होता है। जैसे-'प्रस्कण्व' शब्दमें 'कण्व का पुत्र' अर्थ होता है । अथवा 'प्रमदक' शब्द से 'प्रमगन्द' हुआ । प्रमदक' क्या? जो 'यही लोक है, किन्तु पर लोक नहीं' ऐसे अभिप्राय वाला मनुष्य वह 'प्रमाद करने वाला ' होने से 'प्रमदक' है । इस पक्षमें 'प्र' ( उप० ) और 'मद्' ( दि० प० ) धातु के योग से 'प्रमद्' शब्द और उस के विकार से 'प्रमगन्द' शब्द हुआ । अथवा 'षण्डक'-हीजड़ा 'प्रमगन्द' होता है। इसमें शब्द की समानता बहुत थोड़ी, और अर्थ की समानता बहुत है । 'षण्डक' क्या ! 'षण्डग' , षण्ड हीजड़े को गमन करने वाला । [ क्योंकि हीजड़ा हीजड़े के पास ही रहता है, अन्यत्र उसका निर्वाह नहीं होता । ]