निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३५० ) ६ अ० ६ पा० ५ खंड अथवा 'प्रादक' होने से 'पण्डक' है। क्योंकि-वह अञ्जानों के साथ स्त्री के रूपमें मैथुन कर्म में प्रवृत्त हुआ आण्डों (आंडों) को अर्द्दन-पीडन करता है। 'आण्ड' क्यों ? आंक्षिणों (कीलों या डहियों) के समान होने से। उनको (होजड़ा (व्रीडन करता है, (पपोलता है) या स्तम्भन करता है (थामता है) इस रीति से आण्डव्रीडन से या आण्डस्तम्भन से पण्डक है। 'नैचाशाख' क्या ? नीचाशाख = नीचैःशाख = जिसकी शाखा झुकी हुई हो, अर्थात्-नीचकुलमें उत्पन्न होने वाला। 'शाखा' कैसे ? शक्ति अर्थमें 'शक्' (स्वा०उ०) धातुसे है। 'आणि' कैसे ? अरण = गमन से । 'ऋ०' (भ्वा० प०) धातु से। 'रन्धय' यह वशगमन-वशमें होना अर्थ में 'रध' (दि० प०) धातु है। (णिच्का रूप है।) 'बुन्द' (१२८) इषु-बाण होता है। 'बुन्द' क्यों ? अथवा 'भिन्द' होता है। अथवा 'भयद्' भयका देनेवाला है। अथवा भासमान (चमकता हुआ) चलता है ॥४(३२)॥ (खं० ५) निरु०-“तुविक्षंते सुकृतं सूमयं धनुः साधु- र्बुन्दो हिरण्ययः। उभा ते बाहू रण्या सुसंस्कृत ऋदू- पे चिद्ददृवृधा ॥” (ऋ० सं० ६, ५, ३०, ६) ॥ 'तुविक्षं' बहुविक्षेपम् । महाविक्षेपम् वा । ते, 'सुकृतं' 'सूमयं' सुसुखं धनुः साधयिता । ते, बुन्दो हिरण्ययः । उभौ ते बाहू रण्यौ