निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३५१ ) ६ अ० ६ पा० ५ खं० रमणीयौ सांग्राम्यौ वा । ऋदूपे अर्दनपातिनौ गमनपातिनौ शब्दपाति- नौ दूरपातिनौ वा । मर्माणि वेधिनौ गमनवेधिनौ शब्दवेधिनौ दूर- वेधिनौ वा ॥ ५ ( ३३ ) ॥ “तुविक्षं ते सुकृतम्” इस ऋचा का और “निराविध्यत्” इस ऋचा का कुरुस्तुति ऋषि, इन्द्र देवता, पहिली का सतोबृहती छन्द और दूसरी का गायत्री छन्द है। अर्थः-हे इन्द्र ! ‘ते’ तेरा ‘धनुः’ धनुष् ‘तुविक्षम्’ (बहुवि- क्षेपम् महाविक्षेपं वा ) अनेक प्रकार वाणोंको फेंकनेवाला या दूर फेंकनेवाला है, ‘सुकृतम्’ उससे शोभन कर्म किये जाते हैं, अथवा अच्छा कियागया-बनाया हुआ है। ‘सूमयम्’ सुखमय- सुखरूप है, (ते) तेरा ‘बुन्दः’ बाण ‘साधुः’ स्तुतिओंका साधने वाला अथवा शत्रुओंका साधनेवाला और ‘हिरण्ययः’ सोनेका है। ‘ते’ तेरे ‘उभा’ (उभौ, दोनों ‘बाहू’ भुज ‘रण्यौ’ रमणीय-सुन्दर अथवा रण के योग्य हैं, ‘सुसंस्कृता’ (सुसंस्कृतौ) सुन्दर शिक्षा प्राप्त हैं । ‘ऋदूपे’ अर्दनपाती-दुःखदायिओं पर गिरने वाले अथवा गमनपाती-शत्रुओं पर जाकर गिरनेवाले, किन्तु कायरों के समान खटिया पर गिरने वाले नहीं, अथवा शब्द- पाती-शत्रु की ललकार के साथ गिरने वाले, अथवा दूरपाती दूर तक जाने वाले हैं, ‘ऋदूवृधा’ (ऋदूवृधौ) ‘ऋदू’ यह मर्म स्थान का नाम है, उसमें वेधने वाले, अथवा अर्दनवेधी-पीडा करने वालों पर बिँधने वाले, अथवा गमनवेधी-जाकर बेधने वाले अथवा शब्दवेधी अथवा दूरवेधी हैं। इस प्रकार यहां धनुष् के सम्बन्ध से ‘बुन्द’ नाम बाणका है ॥ भगवद्दुर्गाचार्य