निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 765, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३५२ ) ६ अ० ६ पा० ५ खं० कहते हैं कि-इस मन्त्रमें “ऋदूपे” और “ऋदूवृधा” इन दो पदों का भाष्य ठीक जैसा प्रतीत नहीं होता, उसका ठीक पाठ ढूंढकर फिर व्याख्या करना चाहिए। किन्तु उन्होंने जो भाष्य की व्याख्या की उससे वे पद ठीक लग जाते हैं । दोनों शब्दों में धातुओं के साथ लगे हुए 'ऋदू' शब्द के अर्थों का ही भाष्यकार विकल्प करते हैं । वे-अर्दन (१) गमन (२) शब्द (३) दूर (४) ये चार हैं । पहिले शब्द ( ऋदूप ) में 'प' शब्द से पतनार्थक 'पत' ( भ्वा० प० ) धातु और दूसरे शब्द (ऋदूवृधा) में 'वृध्' से वेधार्थक 'वृध' (भ्वा० आ०) धातु लिया गया है। यदि “ऋदूपे” पदमें 'ऋदूपा' 'ई' ऐसे दो पद रखे जावें तो और भी उस की द्विवचनान्तता तथा “बाहू” की विशेषता सुप्रकट हो जाती है। इसी मन्त्र में इसी बाहू के विशेषण और भी “रण्वा” “सुसंस्कृता” “ऋदूवृधा” इसी ढंग के हैं ॥ ५ ( ३३ ) ॥ ( खं० ६ ) निघ०-वृन्दम् ॥१२९॥ निरु०-“निराविध्यद्गिरिभ्य आधारयत्पक्वमोदनम् । इन्द्रो बुन्दं स्वाततम् ॥” (ऋ० सं० ६, ५, ३०, १) निरविध्यद् गिरिभ्यः, आधारयत् पक्वम्-ओद- नम्-उदकदानं मेघम् । इन्द्रो बुन्दं स्वाततम् । ‘वृन्दं’ बुन्देन व्याख्यातम् ॥ वृन्दारकश्च ॥ ६ ( ३४ ) ॥