निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३५३ ) ६ अ० ६ पा० ७ खं० अर्थः- 'इन्द्रः' इन्द्रदेव ने 'स्वाततम्' कान तक खिंचे हुये 'बुन्दम्' बाणको (से) 'पक्वम्' बहुत मेघों में पके हुये-जल से परिपूर्ण 'ओदनम्' जलके दान में समर्थ मेघ को 'निराविध्यत् वेधा, और 'गिरिभ्यः' मेघों से 'आधारयत्' उनके खाली होने तक जल गिराया। यहां कानतक खींचने के सम्बन्ध से 'बुन्द' बाण का नाम है। यह उदाहरण पूर्व उदाहरण से अधिक स्पष्ट है। 'ओदन' क्या ? उदकदान-जलका देने वाला ॥ 'वृन्द' (१२६) यह अनवगत 'बुन्द' के समान ही सम- झना चाहिए-इसकी व्याख्या उसीसे की गई ॥ 'वृन्दारक' शब्द भी 'बुन्द' के व्याख्यान से ही समझना चाहिए ॥ ६ (३४) ॥ ( खं० ७ ) निघ०—किः ॥१३०॥ उल्बम् ॥१३१॥ ऋबीसम्-ऋबीसम् ॥१३२॥ इति द्वात्रिंशच्छतं (१३२) पदानि ॥३॥ निघ०खं०सू०-“जहा सस्निम्-आशुशुक्षणिः त्रीणि” इति निघण्टौ चतुर्थोऽध्यायः ॥४॥ निरु०-“अयं यो होता किरु सयमस्य कमप्यूहे यत्समञ्जन्ति देवाः। अहरहर्जायते मासि मास्य- था देवादिधिरे हव्यवाहम् ॥” [ऋ०सं० ८,१,१२,३] अयं यो होता कर्त्ता सः यमस्य, कम्-अपि अ- न्नम्-अभिवहति, यत् समश्नुवन्ति देवाः । अहर- ४५