भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 767

हिन्दी निरुक्त ( ३५४ ) ६ अ० ६ पा० ७ खं० हर्जायते, मासे मासे अर्द्धमासे अर्द्धमासे वा। अथ देवा निदधिरे हव्यवाहम्। 'उल्बम्' ऊर्णोतेः। वृणोते र्वा। “महत्तदुल्बं स्थविरं तदासीत्” (ऋ० सं० ६, १, १०, १) इत्यपि निगमो भवति। 'ऋबीसम्' अपगतभासम्। अपहृतभासम्। अ- न्तर्हितभासम्। गतभासं वा ॥ ७ (३५) ॥ 'किः' (१३०) यह अनवगत 'कर्त्ता' पद के अर्थ में है। “अयं होता” इस ऋचा के विश्वेदेव ऋषि और अग्नि देवता है। सौचीक अग्नि और विश्वदेवों के संवाद सूक्त की यह ऋचा है। वहा यह विश्वेदेव ऋषियो का वाक्य है। अर्थः- यः अयम् (अग्निः) जो यह अग्नि 'होता' (आ- हाता देवानाम्) देवताओं को बुलाने वाला (पृथिवीस्थानः) पृथ्वी में रहने वाला है, 'सः' वह 'यमस्य' (भगवतः आदि- त्यस्य) भगवान् सूर्य देव का 'किः' (कर्त्ता) करने वाला है। [क्योंकि-अग्नि से ही प्रातःकाल सूर्य उत्पन्न होता है। सो कहा है- "एषः प्रातः प्रसुवति तस्मात् प्रातर्नोपति- ष्ठन्ते” अर्थात् यह प्रातःकाल जन्मता है, इस कारण इसे प्रातःकाल उपस्थान नहीं करते। आदित्य का 'यम' नाम है, यह “यस्मिन् वृक्षे सुपलाशे” (ऋ० सं० ८, ७, २३, १) इस ऋचा पे कहा जावेगा।] 'कम्-अपि-ऊहे' (अन्नम्-अपि- अमिवहति) उस अन्नको भी लेजाता है, 'यत्-देवाः-समज्ज- न्ति' (समश्नुवन्ति) जिसे देवता खाते हैं। 'अहः-अहः जायते'