भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 768

हिन्दी निरुक्त ( ३५५ ) ६ प्र० ६ पा० ७ खं० यही अग्नि देव अग्निहोत्रियों के घरों में जगाया जाता हुआ नित्य नित्य महान्-बड़ा होता है। 'मासि-मासि' (मासे- मासे) महीने महीने पितृयज्ञों में होता है। अथवा (अर्द्ध- मासे-अर्द्धमासे) आधे मास आधे मास में दर्श-पूर्णमास कर्मों में होता है। जिससे कि-यह अग्नि देव ऐसे गुणों वाला है, 'अथ' इस कारण इस 'हव्यवाहम्' हव्यों-हविर्यों के पहुंचाने वाले अग्नि को 'देवाः' देवताओं ने 'दधिरे' (निदधिरे) स्थापन किया था। इस प्रकार यहां 'यमस्य' इस षष्ठी के योगसे और शब्द की समानता से 'किः' यह 'कर्त्ता' के अर्थ में है ॥ 'उल्ब' (१३१) यह अनवगत जरायु-जेर का नाम है। आच्छादन (ढांपना) अर्थ में 'ऊर्णु' (अदा०उ०) धातु से है। अथवा उसी अर्थ में 'वृ' (स्वा०उ०) धातुसे है। क्योंकि- उससे गर्भ चारों ओर ढाप लिया जाता है। "महत्तदुल्बं स्थविरं तदासीद्येनाविष्टः प्रविवेशिथापः । विश्वा अपश्यद्बहुधा ते अग्ने जातवेदस्तन्वो देव एकः ॥" इस ऋचा के विश्वेदेव ऋषि और अग्नि देवता है। 'अग्ने !' हे भगवन् ! अग्निदेव 'तत्' वह 'महत्' परिमाण से बड़ा और 'स्थविरम्' (चिरंतनम्) पुराना 'उल्बम्' (जरायु) जेर 'आसीत्' था, 'येन' जिससे 'आविष्टितः' (आवेष्टितः) लिपटे हुए (त्वम्) तैने पहिले आदि सृष्टि में 'अपः' प्रविवेशिथ' जलमें प्रवेश किया था। और 'जात-वेदः' हे जातवेदस् ! -जाये जाये को जानने वाले ! 'ते'तेरे 'बहुधा' अनेक प्रकार के 'विश्वाः' सब 'तन्वः' शरीरों को 'एकः' एक 'देवः' प्रजापतिदेव ने 'अपश्यत्' देखा है, अर्थात् और