निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३५६ ) ६ अ० ६ पा० ८खं० कौन तेरे शरीरों के अन्त को जान सकता है। यह भी निगम है। इस प्रकार यहांपर आवेष्टन या लपेटनेके सम्बन्धसे 'उल्ब' शब्द से जरायु या जेर लिया जाना उपपन्न होता है। 'ऋबीस' (१३२) यह अनवगत पृथिवी का नाम है। इसकी शब्द समाधिएँ, अपगतभास्,-जिससे चमक हटीहुई है, 'अपहृतभास्'-जिससे चमक हर ली गई है, 'अन्तर्हितभास्' चमक जिसके भीतर घुस गई है, और 'गतभास्' जिसकी चमक गत होगई है, ये हैं ॥ ७ (३५) ॥ (खं० ८) निरु०-“हिमेनाग्निं घ्रंसमवारयेथां पितुमती मूं मस्माअधत्तम् । ऋबीसे अत्रिमश्विनावनीत मुन्नि- न्यथुः सर्वगणं स्वस्ति ॥” (ऋ०सं० १,८,९,३) हिमेन = उदकेन ग्रीष्मान्ते अग्नि घ्रंसम् = अहः अवारयेथाम्, अन्नवतीं च अस्मै ऊर्जम्-अधत्तम्, यः अयम् ऋबीसे = पृथिव्याम् अग्निः अन्तःओ- षधिवनस्पतिषु अप्सु तम्-उन्निन्यथुः सर्वगणं = सर्वनामानम् ॥ 'गणः' गणनात् । गुणश्च । यद्दृष्टे ओषधयः उद्यन्ति, प्राणिनश्च पृथिव्यां, तत्-अश्विनोः रूपम्, तेन एतौ स्तौति स्तौति ॥ ८ (३६) ॥ इति षष्ठाध्यायस्य षष्ठः पादः ॥ ६, ६, ॥