निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३५७ ) ६ अ० ६ पा० ८ खं० “हिमेनाग्निम्” इस ऋचाका कक्षीवान् ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द और अश्विनी कुमार देवता हैं । प्रातरनुवाक और आश्विन में शस्त्र है । अर्थः-‘अश्विनौ !' हे अश्विनौ ! (युवाम्) तुम दोनों ने ( ग्रीष्मान्ते ) ग्रीष्म ऋतुके अन्त में 'अग्निम्' अग्निके समान गरम 'घंसम्' (अह्नः) दिनको 'हिमेन' ( उदकेन ) जलसे 'अवा- रयेथाम्' निवारण किया है । और निवारण कर के ' अस्मै ' ( हविर्भाजे अग्नये ) इस हविके भजने वाले-भोगने वाले-खाने वाले अग्निदेव के लिये ' पितुमतीम् ' ( अन्नवतीम् ) 'ऊर्जम्' ( आज्यलक्षखाम् ) 'अधत्तम्' पुरोडाश आदि रूप अन्नके सहित घृत रूप ऊर्ज- बलको धारण कियो है । 'ऋबीसे' (पृथिव्याम्) जो यह पृथिवी में या ओषधि-वनस्पतियों में भीतर प्रविष्ट हुआ अग्नि है, जिससे पृथ्वी के गर्भमें रखे हुए कन्द मूलादि पकते हैं, उस 'अत्रिम्' अग्नि को ( अप्सु ) 'अनीतम्' जल में पहुंचाया है, जो कि बिजली के रूपम बादलों में चमकता है, और जिसको न्यायशास्त्र में अबिन्धन = जलको जलाने वाला कहते हैं । हे अश्विनौ ! तुम दोनों ने 'स्वस्ति' सब जगत् के कल्याण के लिये 'सर्वगणम्' ( सर्वनामानम् ) सब नामों वाले अग्निको 'उन्निन्थुः' उन्नयन किया है-आविष्कार किया है, या और तत्वोंमें से छान कर निकाला है । संक्षिप्त अर्थ यह हुआ कि-अश्विन् देवता ही ग्रीष्म ऋतु के अन्तमें वर्षा लाकर दिनों को ठंडा करते हैं। वर्षा के द्वारा सब ओषधियों को उत्पन्न करते हैं, और उनसे उत्पन्न पुरो- डाश तथा घृत अग्निको देते हैं। वेही अश्विन देवता पृथिवी के गर्भ से अग्नि को ऊपर आकाश में ले आते हैं, जो बिजली के रूप में प्रत्यक्ष होता है, और उन्हीं अश्विन देवों ने सब