भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 771, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 771

जगत् के कल्याण के अर्थ अग्निका आविष्कार किया है । इस प्रकार इस मन्त्रमें 'ऋबीस' पृथिवी का नाम होता है ॥ इस मन्त्र में 'अनीतम्' पद की व्याख्या विशिष्ट रूप से भाष्यमें और उसकी टीका में नहीं दिखाई देती, तो भी मन्त्र के स्वभाव की सहायता से उसका अर्थ लिख दिया गया है । इस मन्त्रमें ऋषि ऋचा के चारों पादों को अलग २ क्रियाओं से अलंकृत करता है, विशेष कर पूर्व दो पादोंको क्रिया पदंसे ही पूर्ण करता आ रहा है, उसी अभ्यास से तृतीय पाद् को कर सकता है, जैसे— (१) “हिमेनाग्निं घंसमवारयेथाम्” (अवारयेथाम्) (लङ्०म०द्वि०) (२) “पितुमती मूर्जमस्मा अधत्तम्” (अधत्तम्) (लङ्०म०द्वि०) (३) “ऋबीसे अत्रिमश्विनावनीतम्” (अनीतम्) (लङ्०म०द्वि०) (४) “उन्निन्यथुः सर्वगणं स्वस्ति” (उन्निन्यथुः) (लिट्०म०द्वि०) इस कल्पना में और पादों के समान तृतीय पाद भी अन्वय में स्वतन्त्र हो जाता है, किन्तु दूसरे पूर्व या पर पाद की क्रिया की अपेक्षा नहीं करता, और इस पाद की क्रिया अन्य पादोंके समान मध्यम पुरुष के द्विवचन की हो जाती है, ऐसी २ समानताएं इस तृतीय पाद को क्रियान्त समझने में बल देती हैं । 'गण' कैसे ? गणना से । क्योंकि-वह बहुत द्रव्यों का संयोगरूप होने से गिना जाता है ।