निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 772, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३५६ ) ६ अ० ६ पा० ३सं० 'गुण' क्यों ? यह भी गणना से ही है। क्योंकि-वह भी गिना जाता है। जैसे-द्विगुण, त्रिगुण इत्यादि। यह 'गण' शब्द के सादृश्य से निर्वचन किया गया है। भाष्यकार दूसरा मन्त्रका संक्षिप्त अर्थ करते हैं— "यद्वृष्टे"०० इत्यादि। अर्थात्-जिसके बरसने पर पृथिवी में ओषधिएं और प्राणी उपजते हैं, यह अश्विनों का रूप है, इसीसे इन दोनोंको ऋषि स्तुति करता है, स्तुति करता है। पदकी आवृत्ति काण्ड (प्रकरण) की समाप्ति की सूचनाके लिये है॥ उपर्युक्त काण्ड के अन्तिम निगम के भी अन्त में 'स्वस्ति' पद है, वह भी समाप्ति के मङ्गल के अर्थ है। यह भाष्यकार के अन्वेषण का महत्व है—“साना और सुगंध” ॥ निरुक्त-षष्ठाध्याय का खण्ड सूत्र— [प्र०पं०] “त्वमग्ने (इन्द्र आशाभ्यस्परि) (१) अलातृणः (२) उद्धृह (३) आजासः (४) [द्वि०पा०] उपलप्रक्षिणी (५) कारुरहम् (६) अस्मेते (७) आयन्त इव यदाते (८) अग्नवंहि (६) [तृ०पा०] सोमानम् (१०) इन्द्रासोमा (११) कृणुष्व (१२) तां अध्वरे (१३) अस्ति हि वः (१४) असूत्तै (१५) प्रवोळ्हा (१६) [च०पा०] सृप्रः (स्तिपा आपः) (१७) तुञ्जे तुञ्जे (१८) यो अस्मै (१६) अस्मै इदु (२०) तन्तस्तुरीपं (२१) हिनोता (स्थूलं राधः) (२२) [पं०पा०] अस्मन्नः (२३) मात्वा (२४) न्व पापासो (२५) यवं वृकेण (२६) जीवान्दो (२७) बतो (२८)