निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
हिन्दी निरुक्त ( ३५४ ) ६ अ० ६ पा० ७ खं० हर्जायते, मासे मासे अर्द्धमासे अर्द्धमासे वा। अथ देवा निदधिरे हव्यवाहम्। 'उल्बम्' ऊर्णोतेः। वृणोते र्वा। “महत्तदुल्बं स्थविरं तदासीत्” (ऋ० सं० ६, १, १०, १) इत्यपि निगमो भवति। 'ऋबीसम्' अपगतभासम्। अपहृतभासम्। अ- न्तर्हितभासम्। गतभासं वा ॥ ७ (३५) ॥ 'किः' (१३०) यह अनवगत 'कर्त्ता' पद के अर्थ में है। “अयं होता” इस ऋचा के विश्वेदेव ऋषि और अग्नि देवता है। सौचीक अग्नि और विश्वदेवों के संवाद सूक्त की यह ऋचा है। वहा यह विश्वेदेव ऋषियो का वाक्य है। अर्थः- यः अयम् (अग्निः) जो यह अग्नि 'होता' (आ- हाता देवानाम्) देवताओं को बुलाने वाला (पृथिवीस्थानः) पृथ्वी में रहने वाला है, 'सः' वह 'यमस्य' (भगवतः आदि- त्यस्य) भगवान् सूर्य देव का 'किः' (कर्त्ता) करने वाला है। [क्योंकि-अग्नि से ही प्रातःकाल सूर्य उत्पन्न होता है। सो कहा है- "एषः प्रातः प्रसुवति तस्मात् प्रातर्नोपति- ष्ठन्ते” अर्थात् यह प्रातःकाल जन्मता है, इस कारण इसे प्रातःकाल उपस्थान नहीं करते। आदित्य का 'यम' नाम है, यह “यस्मिन् वृक्षे सुपलाशे” (ऋ० सं० ८, ७, २३, १) इस ऋचा पे कहा जावेगा।] 'कम्-अपि-ऊहे' (अन्नम्-अपि- अमिवहति) उस अन्नको भी लेजाता है, 'यत्-देवाः-समज्ज- न्ति' (समश्नुवन्ति) जिसे देवता खाते हैं। 'अहः-अहः जायते'
हिन्दी निरुक्त ( ३५५ ) ६ प्र० ६ पा० ७ खं० यही अग्नि देव अग्निहोत्रियों के घरों में जगाया जाता हुआ नित्य नित्य महान्-बड़ा होता है। 'मासि-मासि' (मासे- मासे) महीने महीने पितृयज्ञों में होता है। अथवा (अर्द्ध- मासे-अर्द्धमासे) आधे मास आधे मास में दर्श-पूर्णमास कर्मों में होता है। जिससे कि-यह अग्नि देव ऐसे गुणों वाला है, 'अथ' इस कारण इस 'हव्यवाहम्' हव्यों-हविर्यों के पहुंचाने वाले अग्नि को 'देवाः' देवताओं ने 'दधिरे' (निदधिरे) स्थापन किया था। इस प्रकार यहां 'यमस्य' इस षष्ठी के योगसे और शब्द की समानता से 'किः' यह 'कर्त्ता' के अर्थ में है ॥ 'उल्ब' (१३१) यह अनवगत जरायु-जेर का नाम है। आच्छादन (ढांपना) अर्थ में 'ऊर्णु' (अदा०उ०) धातु से है। अथवा उसी अर्थ में 'वृ' (स्वा०उ०) धातुसे है। क्योंकि- उससे गर्भ चारों ओर ढाप लिया जाता है। "महत्तदुल्बं स्थविरं तदासीद्येनाविष्टः प्रविवेशिथापः । विश्वा अपश्यद्बहुधा ते अग्ने जातवेदस्तन्वो देव एकः ॥" इस ऋचा के विश्वेदेव ऋषि और अग्नि देवता है। 'अग्ने !' हे भगवन् ! अग्निदेव 'तत्' वह 'महत्' परिमाण से बड़ा और 'स्थविरम्' (चिरंतनम्) पुराना 'उल्बम्' (जरायु) जेर 'आसीत्' था, 'येन' जिससे 'आविष्टितः' (आवेष्टितः) लिपटे हुए (त्वम्) तैने पहिले आदि सृष्टि में 'अपः' प्रविवेशिथ' जलमें प्रवेश किया था। और 'जात-वेदः' हे जातवेदस् ! -जाये जाये को जानने वाले ! 'ते'तेरे 'बहुधा' अनेक प्रकार के 'विश्वाः' सब 'तन्वः' शरीरों को 'एकः' एक 'देवः' प्रजापतिदेव ने 'अपश्यत्' देखा है, अर्थात् और
हिन्दी निरुक्त ( ३५६ ) ६ अ० ६ पा० ८खं० कौन तेरे शरीरों के अन्त को जान सकता है। यह भी निगम है। इस प्रकार यहांपर आवेष्टन या लपेटनेके सम्बन्धसे 'उल्ब' शब्द से जरायु या जेर लिया जाना उपपन्न होता है। 'ऋबीस' (१३२) यह अनवगत पृथिवी का नाम है। इसकी शब्द समाधिएँ, अपगतभास्,-जिससे चमक हटीहुई है, 'अपहृतभास्'-जिससे चमक हर ली गई है, 'अन्तर्हितभास्' चमक जिसके भीतर घुस गई है, और 'गतभास्' जिसकी चमक गत होगई है, ये हैं ॥ ७ (३५) ॥ (खं० ८) निरु०-“हिमेनाग्निं घ्रंसमवारयेथां पितुमती मूं मस्माअधत्तम् । ऋबीसे अत्रिमश्विनावनीत मुन्नि- न्यथुः सर्वगणं स्वस्ति ॥” (ऋ०सं० १,८,९,३) हिमेन = उदकेन ग्रीष्मान्ते अग्नि घ्रंसम् = अहः अवारयेथाम्, अन्नवतीं च अस्मै ऊर्जम्-अधत्तम्, यः अयम् ऋबीसे = पृथिव्याम् अग्निः अन्तःओ- षधिवनस्पतिषु अप्सु तम्-उन्निन्यथुः सर्वगणं = सर्वनामानम् ॥ 'गणः' गणनात् । गुणश्च । यद्दृष्टे ओषधयः उद्यन्ति, प्राणिनश्च पृथिव्यां, तत्-अश्विनोः रूपम्, तेन एतौ स्तौति स्तौति ॥ ८ (३६) ॥ इति षष्ठाध्यायस्य षष्ठः पादः ॥ ६, ६, ॥
हिन्दी निरुक्त ( ३५७ ) ६ अ० ६ पा० ८ खं० “हिमेनाग्निम्” इस ऋचाका कक्षीवान् ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द और अश्विनी कुमार देवता हैं । प्रातरनुवाक और आश्विन में शस्त्र है । अर्थः-‘अश्विनौ !' हे अश्विनौ ! (युवाम्) तुम दोनों ने ( ग्रीष्मान्ते ) ग्रीष्म ऋतुके अन्त में 'अग्निम्' अग्निके समान गरम 'घंसम्' (अह्नः) दिनको 'हिमेन' ( उदकेन ) जलसे 'अवा- रयेथाम्' निवारण किया है । और निवारण कर के ' अस्मै ' ( हविर्भाजे अग्नये ) इस हविके भजने वाले-भोगने वाले-खाने वाले अग्निदेव के लिये ' पितुमतीम् ' ( अन्नवतीम् ) 'ऊर्जम्' ( आज्यलक्षखाम् ) 'अधत्तम्' पुरोडाश आदि रूप अन्नके सहित घृत रूप ऊर्ज- बलको धारण कियो है । 'ऋबीसे' (पृथिव्याम्) जो यह पृथिवी में या ओषधि-वनस्पतियों में भीतर प्रविष्ट हुआ अग्नि है, जिससे पृथ्वी के गर्भमें रखे हुए कन्द मूलादि पकते हैं, उस 'अत्रिम्' अग्नि को ( अप्सु ) 'अनीतम्' जल में पहुंचाया है, जो कि बिजली के रूपम बादलों में चमकता है, और जिसको न्यायशास्त्र में अबिन्धन = जलको जलाने वाला कहते हैं । हे अश्विनौ ! तुम दोनों ने 'स्वस्ति' सब जगत् के कल्याण के लिये 'सर्वगणम्' ( सर्वनामानम् ) सब नामों वाले अग्निको 'उन्निन्थुः' उन्नयन किया है-आविष्कार किया है, या और तत्वोंमें से छान कर निकाला है । संक्षिप्त अर्थ यह हुआ कि-अश्विन् देवता ही ग्रीष्म ऋतु के अन्तमें वर्षा लाकर दिनों को ठंडा करते हैं। वर्षा के द्वारा सब ओषधियों को उत्पन्न करते हैं, और उनसे उत्पन्न पुरो- डाश तथा घृत अग्निको देते हैं। वेही अश्विन देवता पृथिवी के गर्भ से अग्नि को ऊपर आकाश में ले आते हैं, जो बिजली के रूप में प्रत्यक्ष होता है, और उन्हीं अश्विन देवों ने सब
जगत् के कल्याण के अर्थ अग्निका आविष्कार किया है । इस प्रकार इस मन्त्रमें 'ऋबीस' पृथिवी का नाम होता है ॥ इस मन्त्र में 'अनीतम्' पद की व्याख्या विशिष्ट रूप से भाष्यमें और उसकी टीका में नहीं दिखाई देती, तो भी मन्त्र के स्वभाव की सहायता से उसका अर्थ लिख दिया गया है । इस मन्त्रमें ऋषि ऋचा के चारों पादों को अलग २ क्रियाओं से अलंकृत करता है, विशेष कर पूर्व दो पादोंको क्रिया पदंसे ही पूर्ण करता आ रहा है, उसी अभ्यास से तृतीय पाद् को कर सकता है, जैसे— (१) “हिमेनाग्निं घंसमवारयेथाम्” (अवारयेथाम्) (लङ्०म०द्वि०) (२) “पितुमती मूर्जमस्मा अधत्तम्” (अधत्तम्) (लङ्०म०द्वि०) (३) “ऋबीसे अत्रिमश्विनावनीतम्” (अनीतम्) (लङ्०म०द्वि०) (४) “उन्निन्यथुः सर्वगणं स्वस्ति” (उन्निन्यथुः) (लिट्०म०द्वि०) इस कल्पना में और पादों के समान तृतीय पाद भी अन्वय में स्वतन्त्र हो जाता है, किन्तु दूसरे पूर्व या पर पाद की क्रिया की अपेक्षा नहीं करता, और इस पाद की क्रिया अन्य पादोंके समान मध्यम पुरुष के द्विवचन की हो जाती है, ऐसी २ समानताएं इस तृतीय पाद को क्रियान्त समझने में बल देती हैं । 'गण' कैसे ? गणना से । क्योंकि-वह बहुत द्रव्यों का संयोगरूप होने से गिना जाता है ।
हिन्दी निरुक्त ( ३५६ ) ६ अ० ६ पा० ३सं० 'गुण' क्यों ? यह भी गणना से ही है। क्योंकि-वह भी गिना जाता है। जैसे-द्विगुण, त्रिगुण इत्यादि। यह 'गण' शब्द के सादृश्य से निर्वचन किया गया है। भाष्यकार दूसरा मन्त्रका संक्षिप्त अर्थ करते हैं— "यद्वृष्टे"०० इत्यादि। अर्थात्-जिसके बरसने पर पृथिवी में ओषधिएं और प्राणी उपजते हैं, यह अश्विनों का रूप है, इसीसे इन दोनोंको ऋषि स्तुति करता है, स्तुति करता है। पदकी आवृत्ति काण्ड (प्रकरण) की समाप्ति की सूचनाके लिये है॥ उपर्युक्त काण्ड के अन्तिम निगम के भी अन्त में 'स्वस्ति' पद है, वह भी समाप्ति के मङ्गल के अर्थ है। यह भाष्यकार के अन्वेषण का महत्व है—“साना और सुगंध” ॥ निरुक्त-षष्ठाध्याय का खण्ड सूत्र— [प्र०पं०] “त्वमग्ने (इन्द्र आशाभ्यस्परि) (१) अलातृणः (२) उद्धृह (३) आजासः (४) [द्वि०पा०] उपलप्रक्षिणी (५) कारुरहम् (६) अस्मेते (७) आयन्त इव यदाते (८) अग्नवंहि (६) [तृ०पा०] सोमानम् (१०) इन्द्रासोमा (११) कृणुष्व (१२) तां अध्वरे (१३) अस्ति हि वः (१४) असूत्तै (१५) प्रवोळ्हा (१६) [च०पा०] सृप्रः (स्तिपा आपः) (१७) तुञ्जे तुञ्जे (१८) यो अस्मै (१६) अस्मै इदु (२०) तन्तस्तुरीपं (२१) हिनोता (स्थूलं राधः) (२२) [पं०पा०] अस्मन्नः (२३) मात्वा (२४) न्व पापासो (२५) यवं वृकेण (२६) जीवान्दो (२७) बतो (२८)
हिन्दी निरुक्त ( ३६० ) ६ अ० ६ पा० ८ खं०
धेनुं नः ( आधवः ) (२६) [वष्पा ] अरायि काणे (३०) वामं
घामं (३१) किं ते (३२) तुविद्यन्ते (३३) निराविध्यत् (३४)
अयं होता (३५) हिमेनाग्निं (३६) षट्त्रिंशत् (३६) ॥ *
इति निरुक्ते पूर्वषट्के षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
इति नैरुक्तः पूर्वार्द्धः समाप्तः ॥
इति हिन्दीनिरुक्ते पूर्वषट्के षष्ठोऽध्यायः
पूर्वार्द्धश्च समाप्तः ॥ ६, ६ ॥
❖ श्रीः ❖ ❖❖❖❖❖❖❖❖❖❖❖❖ ❧ ❖ उत्तरषट्कम् ❖ ❧ ❖❖❖❖❖❖❖❖❖❖❖❖ दैवतं काण्डम् अथ सप्तमोऽध्यायः ॥७॥ ( उपोद्घातः ) प्रथमः पादः ( खं० १ ) नैगम काण्ड की व्याख्या के अनन्तर दैवतकाण्ड की व्याख्या के आरम्भ की प्रतिज्ञा-- (निरु०) अथातो दैवतम् । 'अथ' नैगम की व्याख्या के अनन्तर 'अतः' यहां से दैवत प्रकरण की व्याख्या होगी अथवा 'अतः' जिस से कि-अखिल पुरुषार्थों ( धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ) का हेतु देवता है इस से “दैवत” प्रकरण की व्याख्या होगी ॥ “दैवत” पद की व्याख्या— (निरु०-) तद् यानि नामानि प्राधान्यस्तुतीनां देवतानां तद् “दैवतम्” इति आचक्षते । 'तत्' सो । क्या ? 'प्राधान्यस्तुतीनाम्' प्राधान्य या मुख्यता से स्तुति वाले 'देवतानाम्' देवताओं के 'यानि ना- मानि' जो नाम हैं, 'तद्' “दैवतम्” वह “दैवत” प्रकरण
. हिन्दी निरुक्त ( २ ) ७ अ० १ पा० १ खं० है । यह आचार्य कहते हैं-इस प्रकरण की (दैवत) संज्ञा है। अब पहिले ( १, ६, ६ ) प्रतिज्ञा की हुई "दैवत" की व्याख्या को स्मरण कराता है— [निरु०-] सा एषा देवतोपपरीक्षा । जो पहिले ( प्रथमाध्याय के छठे पाद् छठे खण्ड में ) प्रतिज्ञा की थी कि—"तद् उपरिष्टाद् व्याख्या- स्यामः” (उसको आगे व्याख्यान) करेंगे वही यह देवता पदार्थ की विचार पूर्वक परीक्षा होगी । प्रकरण में प्रतिपादन करने योग्य देवता ( मन्त्रदेवता ) का लक्षण- [निरु०-] यत्काम ऋषिर्यस्यां देवतायाम् आर्थ- पत्यम् इच्छन् स्तुतिं प्रयुङ्क्ते तद्दैवतः स मन्त्रो भवति ॥ जिस किसी अर्थ की कामना से ऋषि जिस देवता में आर्थपत्य या अर्थ के स्वामित्व की इच्छा करता हुआ-यह देवता इस वस्तु का स्वामी है, इसी से मुझे यह वस्तु प्राप्त होगी, ऐसा जानता हुआ, स्तुति करता है, वह मन्त्र उस देवता का होता है-उस मन्त्र में वह देवता होता है (जिस किसी मन्त्र में देवता जानना हो उस मन्त्र में इस लक्षण से देवता जानना होगा) । देवता की स्तुति के स्थानभूत ऋचा के भेद- [निरु०-] तास्त्रिविधा ऋचः । जिन में कहा हुआ देवता का लक्षण भले प्रकार घट जाता है, वे ऋचाएं तीन प्रकार की होती हैं ।
हिन्दी निरुक्त (४) ७ अ० १ पा० १ खं० देवता मन्त्रों में स्तुति किये गये हैं, उन्हीं के नाम ये 'अग्नि' आदि 'देवपत्नी' पर्यन्त हैं। अन्य शब्द जो मन्त्रों में आते हैं, वे सब इनके विशेषण हैं, उनके आधिक्य के कारण वे सब पहिले ही 'निघण्टु' शास्त्र में चार अध्यायों में पढ़े गए और तद्नुसार ही निरुक्त में भी षष्ठ अध्याय तक उन्हीं की व्याख्या की गई है। यदि विशेष्य पद जो देवताओं के नाम हैं, उनकी व्याख्या न की जावे, तो विशेषण शब्दों के अर्थ- ज्ञान होने पर भी नहीं जाना जा सकता,-ये किसके विशे- षण हैं, या किसकी प्रशंसा है, सुतराम् विना विशेष्य पदार्थ के जाने और सब शब्दों के अर्थ का जानना तथा न जानना बराबर है, अर्थात्-व्यर्थ है, इस लिये मन्त्रार्थपरिज्ञान के लिये देवता पदों की व्याख्या परमावश्यक है। जैसा कि- कहा है- “यो हवा अविदितार्षेयच्छन्दोदैवतब्राह्मणेन मन्त्रेण याजयति वाध्यापयति वा स्थाणुं वर्च्छति गत्तेँवा पतति प्रवामीयते पापीयान् भवति, यात- यामान्यस्य छन्दांसि भवन्ति” (सा०वे०आ०ब्रा० १ अ० १ खं०) जो ब्राह्मण मन्त्र के ऋषि छन्द देवता तथा ब्राह्मण के जाने विना उससे यज्ञ कराता है, या अध्यापन करता है, वह जड़ता को प्राप्त होता है, गड्ढे (नरक) में गिरता है, मर जाता है, या अति पापी हो जाता है, और उस के मन्त्र बासी हो जाते हैं।
हिन्दी निरुक्त ( ५ ) ७ अ० १ पा० १ खं० दैवतकाण्ड की भूमिका का उद्देश्य । भाष्यकार यास्क मुनि दैवत काण्ड जो अग्नि आदि देवपत्नी पर्यन्त (१५१) शब्दों के रूप में है, उसकी व्याख्या करने की चिन्ता में हैं, किन्तु वह देखते हैं कि-देवता तत्व मन्त्रों का एक ऐसा मुख्य पदार्थ है, जिसके सम्बन्ध में अनेक ऐसी २ बातें जानना आवश्यक हैं, जिनके जाने बिना यदि देवता वाचक शब्दोंके अर्थों का ज्ञान हो भी जावे, तो भी मनुष्य के लिये अनेक स्थल ऐसे उपस्थित हो सकते हैं, जहां वह जाकर मोह को प्राप्त हो सकता है । जैसे-देवता क्या वस्तु है ? । देवता कितने हैं ? देवताओं के कैसे आकार हैं ? देवताओं का परिवार कैसा है ? उनके कौन २ स्थान हैं ? कौन २ सी वस्तुएँ उनकी निजकी हैं, एवम् जहां उनकी स्तुति होती है, उन मन्त्रों के कितने भेद हैं और जहां मन्त्रों में देवता का निश्चय नहीं होता, वहां उसका कैसे निर्णय किया जावेगा इत्यादि ९ बातों के निर्णय के अर्थ पहिले तीन पादों में एक विस्तृत भूमिका लिखते हैं, जिसके पढ़ने से उक्त प्रकार के सब सन्देह निवृत्त हो जाते हैं। दैवत काण्ड की भूमिका के लिखने में यही उद्देश्य है । मन्त्र का स्वभाव । प्रत्येक मन्त्र में दो बातें अवश्य होती हैं । एक यह कि-ऋषि के द्वारा देवता की स्तुति हो, और दूसरी यह है कि-ऋषि उस स्तवनीय देवता से किसी को मांगे । ऋषि । मन्त्र में किसी देवताको सम्बोधन करके स्तुति करने वाला ऋषि होता है, या जिसको उस मन्त्र का दर्शन हुआ हों, वह ऋषि होता है । ऋषि स्त्रीप्रकृति या पुरुष-
हिन्दी निरुक्त ( ६ ) ७ अ० १ पा० २ खं० प्रकृति दोनों ही प्रकार का होता है, किन्तु अधिकांश पुरुष- प्रकृति । एवम् देवता भी ऋषि होता है, तथा अन्य दिव्य पुरुष भी । ऋषि मन्त्र का कर्त्ता या आद्य वक्ता नहीं होता किन्तु उनका उस मन्त्र में ऋषित्व यही होता है, कि उसे उस मन्त्र का तपोबल से दर्शन हुआ है । मन्त्र स्वतः अनादि तथा नित्य है । " द्रष्टार ऋषयः " (का०सर्वा०कं० १) अर्थात्-मन्त्रके द्रष्टा या साक्षात्कार करने वाले ऋषि होते हैं। देवता । प्रत्येक मन्त्र या सूक्त आदिमें वही देवता होता है, जिसकी वहां स्तुति हो, तथा प्रार्थित अर्थ का प्रभु कहा गया हो । फलका सम्बन्ध । मन्त्र में जिस फल की प्रार्थना की गई होती है, वह प्रार्थना यद्यपि ऋषि की ओर से होती है, तथापि ऋषि का सम्बन्ध नित्य मन्त्र में दर्शन मात्र से होता है, इस से उसका फल प्रयोग करने वाले अधिकारी को होता है ! क्योंकि-नित्य मन्त्रका दर्शन तपोबल से कल्पान्तर में दूसरे ऋषि को भी हो सकता है, इसी से उसका फल ऋषि में आबद्ध नहीं ॥१॥ ( खं० २ ) प्रथमा विभक्ति में परोक्षकृता ऋचाका उदाहरण- [निरु०- ] " इन्द्रो दिव इन्द्र ईशे पृथिव्याः" [ ऋ० सं० ८, ४, १५, ५ ] ॥ इस ऋचा का वैश्वामित्र (विश्वामित्र का पुत्र ) रेभ ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द और सूर्य्यस्तुत्येकाह निष्केवल्यमें विनि- योग है।
हिन्दी निरुक्त (७) ७ अ० १ पा० ३ सू० 'इन्द्रः' माध्यमिक देव (पर्जन्य) 'दिवः ' द्युलोक को 'ईशे' (ईष्टे) ईशन करता है शासन करता है, 'इन्द्रः (एव) इन्द्र ही 'पृथिव्याः' पृथिवी को 'ईशे' ईशन करता है या शासन करता है ॥ द्वितीया में उदाहरण- [ निरु०- ] " इन्द्रमिद् गाथिनो बृहत् " [ ऋ० सं० १, १, १३, १ ]॥ इस ऋचाका मधुच्छन्दस् ऋषि और महाव्रत में महदुक्थ शिरस् पे शस्त्र (शस्त्रावयव) है । 'गाथिन. !' (सामगाः) हे सामके गान करने वालो ' 'इन्द्रम् इत्' (इन्द्रम्-एव) इन्द्र को ही 'बृहत्' (बृहतां साम्ना) बृहत् साम से (अभिष्टुत) आभिमुख्यसे स्तुति करो । तृतीया में उदाहरण-- (निरु०) "इन्द्रेणैते तृत्सवो वेविषणाः" (ऋ० सं० ५, २, २७, ५)। इस ऋचा का वसिष्ठ ऋषि, इन्द्र देवता महाव्रत मे निष्केवल्य दक्षिण पक्ष में शस्त्र है । 'एते' (मेघाः) ये मेघ 'इन्द्रेण' इन्द्रसे 'तृत्सवः' (दारयितव्याः) विदारण करने योग्य 'वेविषाणाः' और व्याप्यमान होते हुए (आप इव) जलों के समान (केनचित् सृष्टाः) किसी से प्रेरित हुये (नीचीः) नीचे २ (अगच्छन्) चले गए । चतुर्थी में उदाहरण- [ निरु०- ] "इन्द्राय साम गायत" (ऋ०मं० ६, ७, १, १) ।
हिन्दी निरुक्त ( ८ ) ७ अ० १ पा० २ खं० इस ऋचाका नृमेधस् ऋषि सात्त्रिकअहनों में स्तोत्रियानु- रूपवर्ग में तृतीय सवन में ब्राह्मणाच्छंसी के शस्त्र में विनि- योग है। हे ( उद्गातारः ? ) साम के गाने वालो ! ' इन्द्राय ' इन्द्रके लिये 'साम' साम को ' गायत ' गाओ ॥ पञ्चमी में उदाहरण— ( निरु०- ) “ नेन्द्रादृते पवते धाम किञ्चन ” [ऋ० सं० ७, २, २२, १] । “सूर्यस्येव ०—० किञ्चन ” वैश्वामित्र रेणु ऋषि, जगती छन्द और पवमान सोम देवता है। ( सोमः ) सोम इन्द्रात्-ऋते इन्द्रंवर्जयित्वा ) इन्द्रको छोड़ कर “ न किञ्चन धाम ( देवतान्तरम् ) पवते ( गच्छति)” किसी दूसरे देवता को नहीं जाता है । षष्ठी में उदाहरण— ( निरु०—) “ इन्द्रस्य नु वीर्याणि प्रवोचम् ” [ऋ०सं० १, २, २६, १] । “इन्द्रस्य नु०—०पर्वतानाम्” इस ऋचाका हिरण्य- स्तूप ऋषि है, और यह निष्केवल्य में शस्त्र है । ( अहम् ) मैं 'इन्द्रस्य' इन्द्र के 'वीर्याणि' (वीरकर्माणि) बीर कर्मों को 'प्रवोचम्' ( ब्रवीमि ) कहता हूं । सप्तमी में उदाहरण- (निरु०-)“इन्द्रे कामा अयंसत” इति ( ) हे (स्तोतारः ! ) स्तुति करने वालो ! ऋत्विजो ! 'कामाः'
हिन्दी निरुक्त ( ६ ) ७ अ० १ पा० २ खं० (दिव्याः पार्थिवाश्च) द्युलोक में होने वाले और पृथिवी में होने वाले सब काम “इन्द्रे अयंसत ” इन्द्र में उपनिबद्ध या आश्रित हैं—वही सब कामों का देने वाला है। प्रत्यक्षकृत ऋचा का लक्षण— (निरु०–) अथ प्रत्यक्षकृता मध्यमपुरुषयोगाः, 'त्वम्' इति च एतेन सर्वनाम्ना ॥८॥ 'अथ अनन्तर जो मन्त्र (ऋचाएं) मध्यम पुरुष की (जा- यसे, जहि, आगच्छ आदि) क्रिया से युक्त हों और 'त्वम्' (युवाम् यूयम्) इस सर्वनाम से देवता कहा गया हो, वे प्रत्यक्ष- कृत हैं। प्रत्यक्षकृत ऋचा का उदाहरण— (निरु०–) “त्वमिन्द्रबलादधि (सहसोजात ओ- जसः। त्वं वृषं वृषेदासि)” (ऋ० सं० ८,८,११,२)। इस सूक्त के देवजामि ऋषि हैं और महारात्रिक पर्याय में प्रशास्ता के स्तोत्र में विनियोग है । 'इन्द्र!' हे इन्द्र 'त्वम्' तू 'बलात्' बल से 'अधिजायसे' अधिक होता है। इस मन्त्र में 'त्वम्' यह पद और 'अधि- जायसे' यह मध्यम पुरुष की क्रिया दोनों देवता के लिये हैं, इस से यह प्रत्यक्षकृत है। दूसरी प्रत्यक्षकृत ऋचा— [निरु०] “विनइन्द्र मृधो जहि” (ऋ०सं० ८, ८,१०,४) इति
हिन्दी निरुक्त (१०) ७ अ० १ पा० २ खं० इन्द्र !' हे इन्द्र 'नः' हमारे (एतान्) इन 'मृधः' युद्ध करने वाले शत्रुओं को 'विजहि' नाश कर । जहां स्तुति करने वाले (ऋत्विज्) प्रत्यक्ष हैं और देवता परोक्ष, ऐसी ऋचाओं की सम्भावना- (निरु०) अथापि प्रत्यक्षकृताः स्तोतारो भवन्ति परोक्षकृतानि स्तोतव्यानि । और भी स्तोता (स्तुति करने वाले) 'त्वम्' आदि पद से कहे जाने के कारण प्रत्यक्ष होते हैं और स्तोतव्य देवता परोक्ष । उदाहरण- [निरु०] “माचिदन्यद्विशंसत” [ऋ० सं० ५, ७, १०, १) इस ऋचा का प्रगाथ ऋषि, बृहती छन्द और तृच अशी- तिओं में विनियोग है। हे (स्तोतारः !) स्तुति करने वालो ! (यूयम्) तुम 'अन्यद् दूसरे किसी देवता को 'मा' मत 'विशंसत' विविध स्तुतियों से स्तुति करो। यहां स्तोता “यूयम्” और “विशंसत” इस क्रिया पद से उक्त हैं, इस से प्रत्यक्ष हैं, और देवता परोक्ष पद का वाच्य है। दूसरा उदाहरण- [निरु०] “कण्वा अभिप्रगायत” [ऋ०सं०१,३, १२, १] इस ऋचा का कण्व ऋषि है। त्रैलीन हविष की याज्या
हिन्दी निरुक्त ( ११ ) ७ अ० १ पा० ३ खं० है। हे 'कारवः !' मेधावी ऋत्विजो ' (यूयम्) तुम सब (देवम्) देवको 'अभिप्रगायत' (अभिष्टुत) स्तुति करो। यह भी पहिली के समान परोक्ष है । तीसरा उदाहरण- (निरु०-) “उपप्रेत कुशिकाश्चेतयध्वम्” इति । ( ऋ०सं०३, ३, २१, २ ) इस ऋचा का विश्वामित्र ऋषि है । 'कुशिकाः !' हे स्तुतिमंत्रों के पुकारने वाले ऋत्विजो ! 'उप-प्र-इत' (गच्छत) जानो 'चेतयध्वम्' और चेतो । यह भी उसी प्रकार परोक्ष है । आध्यात्मिकी का लक्षण- -(निरु०-) अथाध्यात्मिक्य उत्तमपुरुषयोगा 'अहम्' इति च एतेन सर्वनाम्ना । जिन ऋचाओं में देवता के लिये उत्तम पुरुष की क्रिया और 'अहम्' (आवाम्, वयम्) यह सर्वनाम पद हो, वे आध्यात्मिकी ऋचाएं होती हैं। ऐसी ऋचाओं में 'अहम्' पदसे उत्तम पुरुष का और उत्तम पुरुषसे 'अहम्' पदका अध्या- हार करना, यदि न हो । ( खं० ३ ) उदाहरणार्थ कहता है- ( निरु०- ) यथा-एतत् । अर्थात्-जैसे यह- । आध्यात्मिकी का उदाहरण- ( निरु० ) (क) इन्द्रो वैकुण्ठः ॥
हिन्दी निरुक्त ( १२ ) ७ अ० १ पा० ३ खं० “इन्द्रो वैकुण्ठः” इस वाक्य से इन्द्र वैकुण्ठ देवता की ऋचा “अहंभुवम्” से प्रयोजन है। “अहंभुवं वसुनः पूर्व्यस्पतिरहं धनानि संजयामि शाश्वतः” इत्यादि। ( ऋ०सं० ८, १, ५, १ ) इस ऋचा का इन्द्र ऋषि, इन्द्र ही देवता, जगती छन्द और अतिरात्र में द्वितीय पर्याय में होता के शस्त्रमें विनियोग है। (सायणभा०) विकुण्ठा नाम एक आसुरी (राक्षसी) थी उसके तप के प्रभाव से इन्द्र पुत्र हुआ, और वह वैकुण्ठ नाम से प्रसिद्ध हुआ उसकी आत्मस्तुति (अपनी प्रशंसा) से युक्त (ब्रह्म) मन्त्र प्रकट हुआ, वह यह है– “अहंभुवम्०” । ‘अहम्’ मैं ही ‘वसुनः’ (धनस्य) धन का ‘पूर्व्यः’ पहिला ‘पतिः’ पति ‘भुवम्’ (अभवम्) हुआ हूं । (निरु०-) (ख) लबसूक्तम् । लबका सूक्त । “इति वा इति मे मनो गामश्वं सनुयाम्–इति” ऋ० सं० ८,६,२६,१) “इति वा इति०” यह तेरह (१३) ऋचाओं का सातवाँ सूक्त है। गायत्री छन्द, लबरूपको प्राप्त इन्द्र ऋषि और वही देवता है। लब कहता है–‘इति वा इति’ ऐसा ऐसा ‘मे’ मेरा ‘मनः’ मन होता है। कैसे ? “ गाम् अश्वम् सनुयाम् ” इन यजमानों को गो और घोड़े दूं या उपभोग कराऊं ।
(निरु०-) (ग) वागाम्भृणीयम् इति ॥ “वागाम्भृणीय” नाम का सूक्त है, उसमें वाणी ही कहती है-- “अहंरुद्रेभिर्वसुभिश्चरामि” (ऋ०सं०८,७,११,१) । “अहम्०” यह आठ (८) ऋचाओं का तेरहवां सूक्त है । अम्भृण महर्षि की पुत्री 'वाक्' नाम वाली ब्रह्म को जानने वाली विदुषी ने अपने आपे की स्तुति की है, इससे वही ऋषि है । सत् चित् सुखरूप सर्वान्तर्यामी परमात्मा देवता है इसी से यह वाक् उसके अभेद को अनुभव करती हुई सब जगत् के रूप से सब के अधिष्ठान के रूपसे “मैं ही सब कुछ हूं” इस प्रकार अपनी स्तुति करती है । त्रिष्टुप् छन्द है । विनियोग पहिले के समान है । (सा० भा०) । 'अहम्' मैं ही 'रुद्रेभिः' (रुद्रैः) रुद्रों के साथ 'वसुभिः' (आदित्यैः विश्वदेवैः) आदित्यों या सब देवताओं के साथ 'चरामि' विचरती हूं । यहां 'अहम्' और उत्तम पुरुष 'चरामि' दोनों वाग् रूप प्रधान देवता के लिये हैं, इससे यह आध्यात्मिकी है । तीनों प्रकार के मन्त्रों में कोई बहुत हैं और कोई कम हैं, यह कहते हैं- (निरु०-) परोक्षकृताः प्रत्यक्षकृताश्च मन्त्रा भूयिष्ठा अल्पश आध्यात्मिकाः॥ परोक्षकृत और प्रत्यक्षकृत मन्त्र बहुत ही हैं, और आध्यात्मिक थोड़े । तीन लक्षण मन्त्रों के भेद-
हिन्दी निरुक्त ( १४ ) ७ अ० १ पा० ३ खं० (निरु०-) अथापि स्तुतिरेव भवति न आशीर्वादः । और कोई मन्त्रों में स्तुति ही है, किन्तु आशीर्वाद या किसी अर्थ की कामना नहीं । उदाहरण- [ निरु०- ] “ इन्द्रस्य नु वीर्याणि प्रवोचम् ” इति यथा एतस्मिन् सूक्ते ( ऋ०सं० १,७,२,१) ॥ “इन्द्रस्य नु वीर्याणि०” यह पन्दरह ( १५ ) ऋचाओं का दूसरा सूक्त है । आङ्गिरस हिरण्यस्तूप ऋषि त्रिष्टुप् छन्द, इन्द्र देवता और अग्निष्टोम में माध्यन्दिन सवनमें निष्केवल्य शस्त्र में विनियोग है । ( अहम् ) मैं ‘इन्द्रस्य’ इन्द्रके ‘ वीर्याणि ’ पराक्रम-युक्त कर्मों को ‘नु’ शीघ्र ‘प्रवोचम्’ ( ब्रवीमि ) कहता हूं । दूसरा विशेष— [निरु०-] अथापि आशीरेव न स्तुतिः । कुछ मन्त्रों में कामना ही है किन्तु स्तुति नहीं । उदाहरण- (निरु०-) “सुचक्षा अहमक्षीभ्यां भूयासम्, सु- वर्चा मुखेन सुश्रुत्कर्णाभ्यां भूयासम्” इति । प्रजापति ऋषि, यजुः, सविता देवता, और नेत्र के अभि- मन्त्रण में विनियोग है । (पा०गृ०जयरा०भा०) हे सवितृदेव ! ‘अहम्’ मैं ‘अक्षीभ्याम्’ (नेत्राभ्याम्) नेत्रों से ‘सुचक्षाः’ सुन्दर दर्शन शक्ति वाला ‘भूयासम्’ हो जाऊं ।