निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १२ ) ७ अ० १ पा० ३ खं० “इन्द्रो वैकुण्ठः” इस वाक्य से इन्द्र वैकुण्ठ देवता की ऋचा “अहंभुवम्” से प्रयोजन है। “अहंभुवं वसुनः पूर्व्यस्पतिरहं धनानि संजयामि शाश्वतः” इत्यादि। ( ऋ०सं० ८, १, ५, १ ) इस ऋचा का इन्द्र ऋषि, इन्द्र ही देवता, जगती छन्द और अतिरात्र में द्वितीय पर्याय में होता के शस्त्रमें विनियोग है। (सायणभा०) विकुण्ठा नाम एक आसुरी (राक्षसी) थी उसके तप के प्रभाव से इन्द्र पुत्र हुआ, और वह वैकुण्ठ नाम से प्रसिद्ध हुआ उसकी आत्मस्तुति (अपनी प्रशंसा) से युक्त (ब्रह्म) मन्त्र प्रकट हुआ, वह यह है– “अहंभुवम्०” । ‘अहम्’ मैं ही ‘वसुनः’ (धनस्य) धन का ‘पूर्व्यः’ पहिला ‘पतिः’ पति ‘भुवम्’ (अभवम्) हुआ हूं । (निरु०-) (ख) लबसूक्तम् । लबका सूक्त । “इति वा इति मे मनो गामश्वं सनुयाम्–इति” ऋ० सं० ८,६,२६,१) “इति वा इति०” यह तेरह (१३) ऋचाओं का सातवाँ सूक्त है। गायत्री छन्द, लबरूपको प्राप्त इन्द्र ऋषि और वही देवता है। लब कहता है–‘इति वा इति’ ऐसा ऐसा ‘मे’ मेरा ‘मनः’ मन होता है। कैसे ? “ गाम् अश्वम् सनुयाम् ” इन यजमानों को गो और घोड़े दूं या उपभोग कराऊं ।