भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 785, कुल 1282 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 785

(निरु०-) (ग) वागाम्भृणीयम् इति ॥ “वागाम्भृणीय” नाम का सूक्त है, उसमें वाणी ही कहती है-- “अहंरुद्रेभिर्वसुभिश्चरामि” (ऋ०सं०८,७,११,१) । “अहम्०” यह आठ (८) ऋचाओं का तेरहवां सूक्त है । अम्भृण महर्षि की पुत्री 'वाक्' नाम वाली ब्रह्म को जानने वाली विदुषी ने अपने आपे की स्तुति की है, इससे वही ऋषि है । सत् चित् सुखरूप सर्वान्तर्यामी परमात्मा देवता है इसी से यह वाक् उसके अभेद को अनुभव करती हुई सब जगत् के रूप से सब के अधिष्ठान के रूपसे “मैं ही सब कुछ हूं” इस प्रकार अपनी स्तुति करती है । त्रिष्टुप् छन्द है । विनियोग पहिले के समान है । (सा० भा०) । 'अहम्' मैं ही 'रुद्रेभिः' (रुद्रैः) रुद्रों के साथ 'वसुभिः' (आदित्यैः विश्वदेवैः) आदित्यों या सब देवताओं के साथ 'चरामि' विचरती हूं । यहां 'अहम्' और उत्तम पुरुष 'चरामि' दोनों वाग् रूप प्रधान देवता के लिये हैं, इससे यह आध्यात्मिकी है । तीनों प्रकार के मन्त्रों में कोई बहुत हैं और कोई कम हैं, यह कहते हैं- (निरु०-) परोक्षकृताः प्रत्यक्षकृताश्च मन्त्रा भूयिष्ठा अल्पश आध्यात्मिकाः॥ परोक्षकृत और प्रत्यक्षकृत मन्त्र बहुत ही हैं, और आध्यात्मिक थोड़े । तीन लक्षण मन्त्रों के भेद-