भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 783, कुल 1282 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 783

हिन्दी निरुक्त ( ११ ) ७ अ० १ पा० ३ खं० है। हे 'कारवः !' मेधावी ऋत्विजो ' (यूयम्) तुम सब (देवम्) देवको 'अभिप्रगायत' (अभिष्टुत) स्तुति करो। यह भी पहिली के समान परोक्ष है । तीसरा उदाहरण- (निरु०-) “उपप्रेत कुशिकाश्चेतयध्वम्” इति । ( ऋ०सं०३, ३, २१, २ ) इस ऋचा का विश्वामित्र ऋषि है । 'कुशिकाः !' हे स्तुतिमंत्रों के पुकारने वाले ऋत्विजो ! 'उप-प्र-इत' (गच्छत) जानो 'चेतयध्वम्' और चेतो । यह भी उसी प्रकार परोक्ष है । आध्यात्मिकी का लक्षण- -(निरु०-) अथाध्यात्मिक्य उत्तमपुरुषयोगा 'अहम्' इति च एतेन सर्वनाम्ना । जिन ऋचाओं में देवता के लिये उत्तम पुरुष की क्रिया और 'अहम्' (आवाम्, वयम्) यह सर्वनाम पद हो, वे आध्यात्मिकी ऋचाएं होती हैं। ऐसी ऋचाओं में 'अहम्' पदसे उत्तम पुरुष का और उत्तम पुरुषसे 'अहम्' पदका अध्या- हार करना, यदि न हो । ( खं० ३ ) उदाहरणार्थ कहता है- ( निरु०- ) यथा-एतत् । अर्थात्-जैसे यह- । आध्यात्मिकी का उदाहरण- ( निरु० ) (क) इन्द्रो वैकुण्ठः ॥