निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त (४) ७ अ० १ पा० १ खं० देवता मन्त्रों में स्तुति किये गये हैं, उन्हीं के नाम ये 'अग्नि' आदि 'देवपत्नी' पर्यन्त हैं। अन्य शब्द जो मन्त्रों में आते हैं, वे सब इनके विशेषण हैं, उनके आधिक्य के कारण वे सब पहिले ही 'निघण्टु' शास्त्र में चार अध्यायों में पढ़े गए और तद्नुसार ही निरुक्त में भी षष्ठ अध्याय तक उन्हीं की व्याख्या की गई है। यदि विशेष्य पद जो देवताओं के नाम हैं, उनकी व्याख्या न की जावे, तो विशेषण शब्दों के अर्थ- ज्ञान होने पर भी नहीं जाना जा सकता,-ये किसके विशे- षण हैं, या किसकी प्रशंसा है, सुतराम् विना विशेष्य पदार्थ के जाने और सब शब्दों के अर्थ का जानना तथा न जानना बराबर है, अर्थात्-व्यर्थ है, इस लिये मन्त्रार्थपरिज्ञान के लिये देवता पदों की व्याख्या परमावश्यक है। जैसा कि- कहा है- “यो हवा अविदितार्षेयच्छन्दोदैवतब्राह्मणेन मन्त्रेण याजयति वाध्यापयति वा स्थाणुं वर्च्छति गत्तेँवा पतति प्रवामीयते पापीयान् भवति, यात- यामान्यस्य छन्दांसि भवन्ति” (सा०वे०आ०ब्रा० १ अ० १ खं०) जो ब्राह्मण मन्त्र के ऋषि छन्द देवता तथा ब्राह्मण के जाने विना उससे यज्ञ कराता है, या अध्यापन करता है, वह जड़ता को प्राप्त होता है, गड्ढे (नरक) में गिरता है, मर जाता है, या अति पापी हो जाता है, और उस के मन्त्र बासी हो जाते हैं।