भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 775, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 775

. हिन्दी निरुक्त ( २ ) ७ अ० १ पा० १ खं० है । यह आचार्य कहते हैं-इस प्रकरण की (दैवत) संज्ञा है। अब पहिले ( १, ६, ६ ) प्रतिज्ञा की हुई "दैवत" की व्याख्या को स्मरण कराता है— [निरु०-] सा एषा देवतोपपरीक्षा । जो पहिले ( प्रथमाध्याय के छठे पाद् छठे खण्ड में ) प्रतिज्ञा की थी कि—"तद् उपरिष्टाद् व्याख्या- स्यामः” (उसको आगे व्याख्यान) करेंगे वही यह देवता पदार्थ की विचार पूर्वक परीक्षा होगी । प्रकरण में प्रतिपादन करने योग्य देवता ( मन्त्रदेवता ) का लक्षण- [निरु०-] यत्काम ऋषिर्यस्यां देवतायाम् आर्थ- पत्यम् इच्छन् स्तुतिं प्रयुङ्क्ते तद्दैवतः स मन्त्रो भवति ॥ जिस किसी अर्थ की कामना से ऋषि जिस देवता में आर्थपत्य या अर्थ के स्वामित्व की इच्छा करता हुआ-यह देवता इस वस्तु का स्वामी है, इसी से मुझे यह वस्तु प्राप्त होगी, ऐसा जानता हुआ, स्तुति करता है, वह मन्त्र उस देवता का होता है-उस मन्त्र में वह देवता होता है (जिस किसी मन्त्र में देवता जानना हो उस मन्त्र में इस लक्षण से देवता जानना होगा) । देवता की स्तुति के स्थानभूत ऋचा के भेद- [निरु०-] तास्त्रिविधा ऋचः । जिन में कहा हुआ देवता का लक्षण भले प्रकार घट जाता है, वे ऋचाएं तीन प्रकार की होती हैं ।