भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 774

❖ श्रीः ❖ ❖❖❖❖❖❖❖❖❖❖❖❖ ❧ ❖ उत्तरषट्कम् ❖ ❧ ❖❖❖❖❖❖❖❖❖❖❖❖ दैवतं काण्डम् अथ सप्तमोऽध्यायः ॥७॥ ( उपोद्घातः ) प्रथमः पादः ( खं० १ ) नैगम काण्ड की व्याख्या के अनन्तर दैवतकाण्ड की व्याख्या के आरम्भ की प्रतिज्ञा-- (निरु०) अथातो दैवतम् । 'अथ' नैगम की व्याख्या के अनन्तर 'अतः' यहां से दैवत प्रकरण की व्याख्या होगी अथवा 'अतः' जिस से कि-अखिल पुरुषार्थों ( धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ) का हेतु देवता है इस से “दैवत” प्रकरण की व्याख्या होगी ॥ “दैवत” पद की व्याख्या— (निरु०-) तद् यानि नामानि प्राधान्यस्तुतीनां देवतानां तद् “दैवतम्” इति आचक्षते । 'तत्' सो । क्या ? 'प्राधान्यस्तुतीनाम्' प्राधान्य या मुख्यता से स्तुति वाले 'देवतानाम्' देवताओं के 'यानि ना- मानि' जो नाम हैं, 'तद्' “दैवतम्” वह “दैवत” प्रकरण