निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ५ ) ७ अ० १ पा० १ खं० दैवतकाण्ड की भूमिका का उद्देश्य । भाष्यकार यास्क मुनि दैवत काण्ड जो अग्नि आदि देवपत्नी पर्यन्त (१५१) शब्दों के रूप में है, उसकी व्याख्या करने की चिन्ता में हैं, किन्तु वह देखते हैं कि-देवता तत्व मन्त्रों का एक ऐसा मुख्य पदार्थ है, जिसके सम्बन्ध में अनेक ऐसी २ बातें जानना आवश्यक हैं, जिनके जाने बिना यदि देवता वाचक शब्दोंके अर्थों का ज्ञान हो भी जावे, तो भी मनुष्य के लिये अनेक स्थल ऐसे उपस्थित हो सकते हैं, जहां वह जाकर मोह को प्राप्त हो सकता है । जैसे-देवता क्या वस्तु है ? । देवता कितने हैं ? देवताओं के कैसे आकार हैं ? देवताओं का परिवार कैसा है ? उनके कौन २ स्थान हैं ? कौन २ सी वस्तुएँ उनकी निजकी हैं, एवम् जहां उनकी स्तुति होती है, उन मन्त्रों के कितने भेद हैं और जहां मन्त्रों में देवता का निश्चय नहीं होता, वहां उसका कैसे निर्णय किया जावेगा इत्यादि ९ बातों के निर्णय के अर्थ पहिले तीन पादों में एक विस्तृत भूमिका लिखते हैं, जिसके पढ़ने से उक्त प्रकार के सब सन्देह निवृत्त हो जाते हैं। दैवत काण्ड की भूमिका के लिखने में यही उद्देश्य है । मन्त्र का स्वभाव । प्रत्येक मन्त्र में दो बातें अवश्य होती हैं । एक यह कि-ऋषि के द्वारा देवता की स्तुति हो, और दूसरी यह है कि-ऋषि उस स्तवनीय देवता से किसी को मांगे । ऋषि । मन्त्र में किसी देवताको सम्बोधन करके स्तुति करने वाला ऋषि होता है, या जिसको उस मन्त्र का दर्शन हुआ हों, वह ऋषि होता है । ऋषि स्त्रीप्रकृति या पुरुष-