निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ६ ) ७ अ० १ पा० २ खं० (दिव्याः पार्थिवाश्च) द्युलोक में होने वाले और पृथिवी में होने वाले सब काम “इन्द्रे अयंसत ” इन्द्र में उपनिबद्ध या आश्रित हैं—वही सब कामों का देने वाला है। प्रत्यक्षकृत ऋचा का लक्षण— (निरु०–) अथ प्रत्यक्षकृता मध्यमपुरुषयोगाः, 'त्वम्' इति च एतेन सर्वनाम्ना ॥८॥ 'अथ अनन्तर जो मन्त्र (ऋचाएं) मध्यम पुरुष की (जा- यसे, जहि, आगच्छ आदि) क्रिया से युक्त हों और 'त्वम्' (युवाम् यूयम्) इस सर्वनाम से देवता कहा गया हो, वे प्रत्यक्ष- कृत हैं। प्रत्यक्षकृत ऋचा का उदाहरण— (निरु०–) “त्वमिन्द्रबलादधि (सहसोजात ओ- जसः। त्वं वृषं वृषेदासि)” (ऋ० सं० ८,८,११,२)। इस सूक्त के देवजामि ऋषि हैं और महारात्रिक पर्याय में प्रशास्ता के स्तोत्र में विनियोग है । 'इन्द्र!' हे इन्द्र 'त्वम्' तू 'बलात्' बल से 'अधिजायसे' अधिक होता है। इस मन्त्र में 'त्वम्' यह पद और 'अधि- जायसे' यह मध्यम पुरुष की क्रिया दोनों देवता के लिये हैं, इस से यह प्रत्यक्षकृत है। दूसरी प्रत्यक्षकृत ऋचा— [निरु०] “विनइन्द्र मृधो जहि” (ऋ०सं० ८, ८,१०,४) इति