निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ८ ) ७ अ० १ पा० २ खं० इस ऋचाका नृमेधस् ऋषि सात्त्रिकअहनों में स्तोत्रियानु- रूपवर्ग में तृतीय सवन में ब्राह्मणाच्छंसी के शस्त्र में विनि- योग है। हे ( उद्गातारः ? ) साम के गाने वालो ! ' इन्द्राय ' इन्द्रके लिये 'साम' साम को ' गायत ' गाओ ॥ पञ्चमी में उदाहरण— ( निरु०- ) “ नेन्द्रादृते पवते धाम किञ्चन ” [ऋ० सं० ७, २, २२, १] । “सूर्यस्येव ०—० किञ्चन ” वैश्वामित्र रेणु ऋषि, जगती छन्द और पवमान सोम देवता है। ( सोमः ) सोम इन्द्रात्-ऋते इन्द्रंवर्जयित्वा ) इन्द्रको छोड़ कर “ न किञ्चन धाम ( देवतान्तरम् ) पवते ( गच्छति)” किसी दूसरे देवता को नहीं जाता है । षष्ठी में उदाहरण— ( निरु०—) “ इन्द्रस्य नु वीर्याणि प्रवोचम् ” [ऋ०सं० १, २, २६, १] । “इन्द्रस्य नु०—०पर्वतानाम्” इस ऋचाका हिरण्य- स्तूप ऋषि है, और यह निष्केवल्य में शस्त्र है । ( अहम् ) मैं 'इन्द्रस्य' इन्द्र के 'वीर्याणि' (वीरकर्माणि) बीर कर्मों को 'प्रवोचम्' ( ब्रवीमि ) कहता हूं । सप्तमी में उदाहरण- (निरु०-)“इन्द्रे कामा अयंसत” इति ( ) हे (स्तोतारः ! ) स्तुति करने वालो ! ऋत्विजो ! 'कामाः'