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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

हिन्दी निरुक्त ( ३५० ) ६ अ० ६ पा० ५ खंड अथवा 'प्रादक' होने से 'पण्डक' है। क्योंकि-वह अञ्जानों के साथ स्त्री के रूपमें मैथुन कर्म में प्रवृत्त हुआ आण्डों (आंडों) को अर्द्दन-पीडन करता है। 'आण्ड' क्यों ? आंक्षिणों (कीलों या डहियों) के समान होने से। उनको (होजड़ा (व्रीडन करता है, (पपोलता है) या स्तम्भन करता है (थामता है) इस रीति से आण्डव्रीडन से या आण्डस्तम्भन से पण्डक है। 'नैचाशाख' क्या ? नीचाशाख = नीचैःशाख = जिसकी शाखा झुकी हुई हो, अर्थात्-नीचकुलमें उत्पन्न होने वाला। 'शाखा' कैसे ? शक्ति अर्थमें 'शक्' (स्वा०उ०) धातुसे है। 'आणि' कैसे ? अरण = गमन से । 'ऋ०' (भ्वा० प०) धातु से। 'रन्धय' यह वशगमन-वशमें होना अर्थ में 'रध' (दि० प०) धातु है। (णिच्का रूप है।) 'बुन्द' (१२८) इषु-बाण होता है। 'बुन्द' क्यों ? अथवा 'भिन्द' होता है। अथवा 'भयद्' भयका देनेवाला है। अथवा भासमान (चमकता हुआ) चलता है ॥४(३२)॥ (खं० ५) निरु०-“तुविक्षंते सुकृतं सूमयं धनुः साधु- र्बुन्दो हिरण्ययः। उभा ते बाहू रण्या सुसंस्कृत ऋदू- पे चिद्ददृवृधा ॥” (ऋ० सं० ६, ५, ३०, ६) ॥ 'तुविक्षं' बहुविक्षेपम् । महाविक्षेपम् वा । ते, 'सुकृतं' 'सूमयं' सुसुखं धनुः साधयिता । ते, बुन्दो हिरण्ययः । उभौ ते बाहू रण्यौ

हिन्दी निरुक्त ( ३५१ ) ६ अ० ६ पा० ५ खं० रमणीयौ सांग्राम्यौ वा । ऋदूपे अर्दनपातिनौ गमनपातिनौ शब्दपाति- नौ दूरपातिनौ वा । मर्माणि वेधिनौ गमनवेधिनौ शब्दवेधिनौ दूर- वेधिनौ वा ॥ ५ ( ३३ ) ॥ “तुविक्षं ते सुकृतम्” इस ऋचा का और “निराविध्यत्” इस ऋचा का कुरुस्तुति ऋषि, इन्द्र देवता, पहिली का सतोबृहती छन्द और दूसरी का गायत्री छन्द है। अर्थः-हे इन्द्र ! ‘ते’ तेरा ‘धनुः’ धनुष् ‘तुविक्षम्’ (बहुवि- क्षेपम् महाविक्षेपं वा ) अनेक प्रकार वाणोंको फेंकनेवाला या दूर फेंकनेवाला है, ‘सुकृतम्’ उससे शोभन कर्म किये जाते हैं, अथवा अच्छा कियागया-बनाया हुआ है। ‘सूमयम्’ सुखमय- सुखरूप है, (ते) तेरा ‘बुन्दः’ बाण ‘साधुः’ स्तुतिओंका साधने वाला अथवा शत्रुओंका साधनेवाला और ‘हिरण्ययः’ सोनेका है। ‘ते’ तेरे ‘उभा’ (उभौ, दोनों ‘बाहू’ भुज ‘रण्यौ’ रमणीय-सुन्दर अथवा रण के योग्य हैं, ‘सुसंस्कृता’ (सुसंस्कृतौ) सुन्दर शिक्षा प्राप्त हैं । ‘ऋदूपे’ अर्दनपाती-दुःखदायिओं पर गिरने वाले अथवा गमनपाती-शत्रुओं पर जाकर गिरनेवाले, किन्तु कायरों के समान खटिया पर गिरने वाले नहीं, अथवा शब्द- पाती-शत्रु की ललकार के साथ गिरने वाले, अथवा दूरपाती दूर तक जाने वाले हैं, ‘ऋदूवृधा’ (ऋदूवृधौ) ‘ऋदू’ यह मर्म स्थान का नाम है, उसमें वेधने वाले, अथवा अर्दनवेधी-पीडा करने वालों पर बिँधने वाले, अथवा गमनवेधी-जाकर बेधने वाले अथवा शब्दवेधी अथवा दूरवेधी हैं। इस प्रकार यहां धनुष् के सम्बन्ध से ‘बुन्द’ नाम बाणका है ॥ भगवद्दुर्गाचार्य

हिन्दी निरुक्त ( ३५२ ) ६ अ० ६ पा० ५ खं० कहते हैं कि-इस मन्त्रमें “ऋदूपे” और “ऋदूवृधा” इन दो पदों का भाष्य ठीक जैसा प्रतीत नहीं होता, उसका ठीक पाठ ढूंढकर फिर व्याख्या करना चाहिए। किन्तु उन्होंने जो भाष्य की व्याख्या की उससे वे पद ठीक लग जाते हैं । दोनों शब्दों में धातुओं के साथ लगे हुए 'ऋदू' शब्द के अर्थों का ही भाष्यकार विकल्प करते हैं । वे-अर्दन (१) गमन (२) शब्द (३) दूर (४) ये चार हैं । पहिले शब्द ( ऋदूप ) में 'प' शब्द से पतनार्थक 'पत' ( भ्वा० प० ) धातु और दूसरे शब्द (ऋदूवृधा) में 'वृध्' से वेधार्थक 'वृध' (भ्वा० आ०) धातु लिया गया है। यदि “ऋदूपे” पदमें 'ऋदूपा' 'ई' ऐसे दो पद रखे जावें तो और भी उस की द्विवचनान्तता तथा “बाहू” की विशेषता सुप्रकट हो जाती है। इसी मन्त्र में इसी बाहू के विशेषण और भी “रण्वा” “सुसंस्कृता” “ऋदूवृधा” इसी ढंग के हैं ॥ ५ ( ३३ ) ॥ ( खं० ६ ) निघ०-वृन्दम् ॥१२९॥ निरु०-“निराविध्यद्गिरिभ्य आधारयत्पक्वमोदनम् । इन्द्रो बुन्दं स्वाततम् ॥” (ऋ० सं० ६, ५, ३०, १) निरविध्यद् गिरिभ्यः, आधारयत् पक्वम्-ओद- नम्-उदकदानं मेघम् । इन्द्रो बुन्दं स्वाततम् । ‘वृन्दं’ बुन्देन व्याख्यातम् ॥ वृन्दारकश्च ॥ ६ ( ३४ ) ॥

हिन्दी निरुक्त ( ३५३ ) ६ अ० ६ पा० ७ खं० अर्थः- 'इन्द्रः' इन्द्रदेव ने 'स्वाततम्' कान तक खिंचे हुये 'बुन्दम्' बाणको (से) 'पक्वम्' बहुत मेघों में पके हुये-जल से परिपूर्ण 'ओदनम्' जलके दान में समर्थ मेघ को 'निराविध्यत् वेधा, और 'गिरिभ्यः' मेघों से 'आधारयत्' उनके खाली होने तक जल गिराया। यहां कानतक खींचने के सम्बन्ध से 'बुन्द' बाण का नाम है। यह उदाहरण पूर्व उदाहरण से अधिक स्पष्ट है। 'ओदन' क्या ? उदकदान-जलका देने वाला ॥ 'वृन्द' (१२६) यह अनवगत 'बुन्द' के समान ही सम- झना चाहिए-इसकी व्याख्या उसीसे की गई ॥ 'वृन्दारक' शब्द भी 'बुन्द' के व्याख्यान से ही समझना चाहिए ॥ ६ (३४) ॥ ( खं० ७ ) निघ०—किः ॥१३०॥ उल्बम् ॥१३१॥ ऋबीसम्-ऋबीसम् ॥१३२॥ इति द्वात्रिंशच्छतं (१३२) पदानि ॥३॥ निघ०खं०सू०-“जहा सस्निम्-आशुशुक्षणिः त्रीणि” इति निघण्टौ चतुर्थोऽध्यायः ॥४॥ निरु०-“अयं यो होता किरु सयमस्य कमप्यूहे यत्समञ्जन्ति देवाः। अहरहर्जायते मासि मास्य- था देवादिधिरे हव्यवाहम् ॥” [ऋ०सं० ८,१,१२,३] अयं यो होता कर्त्ता सः यमस्य, कम्-अपि अ- न्नम्-अभिवहति, यत् समश्नुवन्ति देवाः । अहर- ४५

हिन्दी निरुक्त ( ३५४ ) ६ अ० ६ पा० ७ खं० हर्जायते, मासे मासे अर्द्धमासे अर्द्धमासे वा। अथ देवा निदधिरे हव्यवाहम्। 'उल्बम्' ऊर्णोतेः। वृणोते र्वा। “महत्तदुल्बं स्थविरं तदासीत्” (ऋ० सं० ६, १, १०, १) इत्यपि निगमो भवति। 'ऋबीसम्' अपगतभासम्। अपहृतभासम्। अ- न्तर्हितभासम्। गतभासं वा ॥ ७ (३५) ॥ 'किः' (१३०) यह अनवगत 'कर्त्ता' पद के अर्थ में है। “अयं होता” इस ऋचा के विश्वेदेव ऋषि और अग्नि देवता है। सौचीक अग्नि और विश्वदेवों के संवाद सूक्त की यह ऋचा है। वहा यह विश्वेदेव ऋषियो का वाक्य है। अर्थः- यः अयम् (अग्निः) जो यह अग्नि 'होता' (आ- हाता देवानाम्) देवताओं को बुलाने वाला (पृथिवीस्थानः) पृथ्वी में रहने वाला है, 'सः' वह 'यमस्य' (भगवतः आदि- त्यस्य) भगवान् सूर्य देव का 'किः' (कर्त्ता) करने वाला है। [क्योंकि-अग्नि से ही प्रातःकाल सूर्य उत्पन्न होता है। सो कहा है- "एषः प्रातः प्रसुवति तस्मात् प्रातर्नोपति- ष्ठन्ते” अर्थात् यह प्रातःकाल जन्मता है, इस कारण इसे प्रातःकाल उपस्थान नहीं करते। आदित्य का 'यम' नाम है, यह “यस्मिन् वृक्षे सुपलाशे” (ऋ० सं० ८, ७, २३, १) इस ऋचा पे कहा जावेगा।] 'कम्-अपि-ऊहे' (अन्नम्-अपि- अमिवहति) उस अन्नको भी लेजाता है, 'यत्-देवाः-समज्ज- न्ति' (समश्नुवन्ति) जिसे देवता खाते हैं। 'अहः-अहः जायते'

हिन्दी निरुक्त ( ३५५ ) ६ प्र० ६ पा० ७ खं० यही अग्नि देव अग्निहोत्रियों के घरों में जगाया जाता हुआ नित्य नित्य महान्-बड़ा होता है। 'मासि-मासि' (मासे- मासे) महीने महीने पितृयज्ञों में होता है। अथवा (अर्द्ध- मासे-अर्द्धमासे) आधे मास आधे मास में दर्श-पूर्णमास कर्मों में होता है। जिससे कि-यह अग्नि देव ऐसे गुणों वाला है, 'अथ' इस कारण इस 'हव्यवाहम्' हव्यों-हविर्यों के पहुंचाने वाले अग्नि को 'देवाः' देवताओं ने 'दधिरे' (निदधिरे) स्थापन किया था। इस प्रकार यहां 'यमस्य' इस षष्ठी के योगसे और शब्द की समानता से 'किः' यह 'कर्त्ता' के अर्थ में है ॥ 'उल्ब' (१३१) यह अनवगत जरायु-जेर का नाम है। आच्छादन (ढांपना) अर्थ में 'ऊर्णु' (अदा०उ०) धातु से है। अथवा उसी अर्थ में 'वृ' (स्वा०उ०) धातुसे है। क्योंकि- उससे गर्भ चारों ओर ढाप लिया जाता है। "महत्तदुल्बं स्थविरं तदासीद्येनाविष्टः प्रविवेशिथापः । विश्वा अपश्यद्बहुधा ते अग्ने जातवेदस्तन्वो देव एकः ॥" इस ऋचा के विश्वेदेव ऋषि और अग्नि देवता है। 'अग्ने !' हे भगवन् ! अग्निदेव 'तत्' वह 'महत्' परिमाण से बड़ा और 'स्थविरम्' (चिरंतनम्) पुराना 'उल्बम्' (जरायु) जेर 'आसीत्' था, 'येन' जिससे 'आविष्टितः' (आवेष्टितः) लिपटे हुए (त्वम्) तैने पहिले आदि सृष्टि में 'अपः' प्रविवेशिथ' जलमें प्रवेश किया था। और 'जात-वेदः' हे जातवेदस् ! -जाये जाये को जानने वाले ! 'ते'तेरे 'बहुधा' अनेक प्रकार के 'विश्वाः' सब 'तन्वः' शरीरों को 'एकः' एक 'देवः' प्रजापतिदेव ने 'अपश्यत्' देखा है, अर्थात् और

हिन्दी निरुक्त ( ३५६ ) ६ अ० ६ पा० ८खं० कौन तेरे शरीरों के अन्त को जान सकता है। यह भी निगम है। इस प्रकार यहांपर आवेष्टन या लपेटनेके सम्बन्धसे 'उल्ब' शब्द से जरायु या जेर लिया जाना उपपन्न होता है। 'ऋबीस' (१३२) यह अनवगत पृथिवी का नाम है। इसकी शब्द समाधिएँ, अपगतभास्,-जिससे चमक हटीहुई है, 'अपहृतभास्'-जिससे चमक हर ली गई है, 'अन्तर्हितभास्' चमक जिसके भीतर घुस गई है, और 'गतभास्' जिसकी चमक गत होगई है, ये हैं ॥ ७ (३५) ॥ (खं० ८) निरु०-“हिमेनाग्निं घ्रंसमवारयेथां पितुमती मूं मस्माअधत्तम् । ऋबीसे अत्रिमश्विनावनीत मुन्नि- न्यथुः सर्वगणं स्वस्ति ॥” (ऋ०सं० १,८,९,३) हिमेन = उदकेन ग्रीष्मान्ते अग्नि घ्रंसम् = अहः अवारयेथाम्, अन्नवतीं च अस्मै ऊर्जम्-अधत्तम्, यः अयम् ऋबीसे = पृथिव्याम् अग्निः अन्तःओ- षधिवनस्पतिषु अप्सु तम्-उन्निन्यथुः सर्वगणं = सर्वनामानम् ॥ 'गणः' गणनात् । गुणश्च । यद्दृष्टे ओषधयः उद्यन्ति, प्राणिनश्च पृथिव्यां, तत्-अश्विनोः रूपम्, तेन एतौ स्तौति स्तौति ॥ ८ (३६) ॥ इति षष्ठाध्यायस्य षष्ठः पादः ॥ ६, ६, ॥

हिन्दी निरुक्त ( ३५७ ) ६ अ० ६ पा० ८ खं० “हिमेनाग्निम्” इस ऋचाका कक्षीवान् ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द और अश्विनी कुमार देवता हैं । प्रातरनुवाक और आश्विन में शस्त्र है । अर्थः-‘अश्विनौ !' हे अश्विनौ ! (युवाम्) तुम दोनों ने ( ग्रीष्मान्ते ) ग्रीष्म ऋतुके अन्त में 'अग्निम्' अग्निके समान गरम 'घंसम्' (अह्नः) दिनको 'हिमेन' ( उदकेन ) जलसे 'अवा- रयेथाम्' निवारण किया है । और निवारण कर के ' अस्मै ' ( हविर्भाजे अग्नये ) इस हविके भजने वाले-भोगने वाले-खाने वाले अग्निदेव के लिये ' पितुमतीम् ' ( अन्नवतीम् ) 'ऊर्जम्' ( आज्यलक्षखाम् ) 'अधत्तम्' पुरोडाश आदि रूप अन्नके सहित घृत रूप ऊर्ज- बलको धारण कियो है । 'ऋबीसे' (पृथिव्याम्) जो यह पृथिवी में या ओषधि-वनस्पतियों में भीतर प्रविष्ट हुआ अग्नि है, जिससे पृथ्वी के गर्भमें रखे हुए कन्द मूलादि पकते हैं, उस 'अत्रिम्' अग्नि को ( अप्सु ) 'अनीतम्' जल में पहुंचाया है, जो कि बिजली के रूपम बादलों में चमकता है, और जिसको न्यायशास्त्र में अबिन्धन = जलको जलाने वाला कहते हैं । हे अश्विनौ ! तुम दोनों ने 'स्वस्ति' सब जगत् के कल्याण के लिये 'सर्वगणम्' ( सर्वनामानम् ) सब नामों वाले अग्निको 'उन्निन्थुः' उन्नयन किया है-आविष्कार किया है, या और तत्वोंमें से छान कर निकाला है । संक्षिप्त अर्थ यह हुआ कि-अश्विन् देवता ही ग्रीष्म ऋतु के अन्तमें वर्षा लाकर दिनों को ठंडा करते हैं। वर्षा के द्वारा सब ओषधियों को उत्पन्न करते हैं, और उनसे उत्पन्न पुरो- डाश तथा घृत अग्निको देते हैं। वेही अश्विन देवता पृथिवी के गर्भ से अग्नि को ऊपर आकाश में ले आते हैं, जो बिजली के रूप में प्रत्यक्ष होता है, और उन्हीं अश्विन देवों ने सब

जगत् के कल्याण के अर्थ अग्निका आविष्कार किया है । इस प्रकार इस मन्त्रमें 'ऋबीस' पृथिवी का नाम होता है ॥ इस मन्त्र में 'अनीतम्' पद की व्याख्या विशिष्ट रूप से भाष्यमें और उसकी टीका में नहीं दिखाई देती, तो भी मन्त्र के स्वभाव की सहायता से उसका अर्थ लिख दिया गया है । इस मन्त्रमें ऋषि ऋचा के चारों पादों को अलग २ क्रियाओं से अलंकृत करता है, विशेष कर पूर्व दो पादोंको क्रिया पदंसे ही पूर्ण करता आ रहा है, उसी अभ्यास से तृतीय पाद् को कर सकता है, जैसे— (१) “हिमेनाग्निं घंसमवारयेथाम्” (अवारयेथाम्) (लङ्०म०द्वि०) (२) “पितुमती मूर्जमस्मा अधत्तम्” (अधत्तम्) (लङ्०म०द्वि०) (३) “ऋबीसे अत्रिमश्विनावनीतम्” (अनीतम्) (लङ्०म०द्वि०) (४) “उन्निन्यथुः सर्वगणं स्वस्ति” (उन्निन्यथुः) (लिट्०म०द्वि०) इस कल्पना में और पादों के समान तृतीय पाद भी अन्वय में स्वतन्त्र हो जाता है, किन्तु दूसरे पूर्व या पर पाद की क्रिया की अपेक्षा नहीं करता, और इस पाद की क्रिया अन्य पादोंके समान मध्यम पुरुष के द्विवचन की हो जाती है, ऐसी २ समानताएं इस तृतीय पाद को क्रियान्त समझने में बल देती हैं । 'गण' कैसे ? गणना से । क्योंकि-वह बहुत द्रव्यों का संयोगरूप होने से गिना जाता है ।

हिन्दी निरुक्त ( ३५६ ) ६ अ० ६ पा० ३सं० 'गुण' क्यों ? यह भी गणना से ही है। क्योंकि-वह भी गिना जाता है। जैसे-द्विगुण, त्रिगुण इत्यादि। यह 'गण' शब्द के सादृश्य से निर्वचन किया गया है। भाष्यकार दूसरा मन्त्रका संक्षिप्त अर्थ करते हैं— "यद्वृष्टे"०० इत्यादि। अर्थात्-जिसके बरसने पर पृथिवी में ओषधिएं और प्राणी उपजते हैं, यह अश्विनों का रूप है, इसीसे इन दोनोंको ऋषि स्तुति करता है, स्तुति करता है। पदकी आवृत्ति काण्ड (प्रकरण) की समाप्ति की सूचनाके लिये है॥ उपर्युक्त काण्ड के अन्तिम निगम के भी अन्त में 'स्वस्ति' पद है, वह भी समाप्ति के मङ्गल के अर्थ है। यह भाष्यकार के अन्वेषण का महत्व है—“साना और सुगंध” ॥ निरुक्त-षष्ठाध्याय का खण्ड सूत्र— [प्र०पं०] “त्वमग्ने (इन्द्र आशाभ्यस्परि) (१) अलातृणः (२) उद्धृह (३) आजासः (४) [द्वि०पा०] उपलप्रक्षिणी (५) कारुरहम् (६) अस्मेते (७) आयन्त इव यदाते (८) अग्नवंहि (६) [तृ०पा०] सोमानम् (१०) इन्द्रासोमा (११) कृणुष्व (१२) तां अध्वरे (१३) अस्ति हि वः (१४) असूत्तै (१५) प्रवोळ्हा (१६) [च०पा०] सृप्रः (स्तिपा आपः) (१७) तुञ्जे तुञ्जे (१८) यो अस्मै (१६) अस्मै इदु (२०) तन्तस्तुरीपं (२१) हिनोता (स्थूलं राधः) (२२) [पं०पा०] अस्मन्नः (२३) मात्वा (२४) न्व पापासो (२५) यवं वृकेण (२६) जीवान्दो (२७) बतो (२८)

हिन्दी निरुक्त ( ३६० ) ६ अ० ६ पा० ८ खं०

धेनुं नः ( आधवः ) (२६) [वष्पा ] अरायि काणे (३०) वामं
घामं (३१) किं ते (३२) तुविद्यन्ते (३३) निराविध्यत् (३४)
अयं होता (३५) हिमेनाग्निं (३६) षट्त्रिंशत् (३६) ॥ *
इति निरुक्ते पूर्वषट्के षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
इति नैरुक्तः पूर्वार्द्धः समाप्तः ॥
इति हिन्दीनिरुक्ते पूर्वषट्के षष्ठोऽध्यायः
पूर्वार्द्धश्च समाप्तः ॥ ६, ६ ॥

❖ श्रीः ❖ ❖❖❖❖❖❖❖❖❖❖❖❖ ❧ ❖ उत्तरषट्कम् ❖ ❧ ❖❖❖❖❖❖❖❖❖❖❖❖ दैवतं काण्डम् अथ सप्तमोऽध्यायः ॥७॥ ( उपोद्घातः ) प्रथमः पादः ( खं० १ ) नैगम काण्ड की व्याख्या के अनन्तर दैवतकाण्ड की व्याख्या के आरम्भ की प्रतिज्ञा-- (निरु०) अथातो दैवतम् । 'अथ' नैगम की व्याख्या के अनन्तर 'अतः' यहां से दैवत प्रकरण की व्याख्या होगी अथवा 'अतः' जिस से कि-अखिल पुरुषार्थों ( धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ) का हेतु देवता है इस से “दैवत” प्रकरण की व्याख्या होगी ॥ “दैवत” पद की व्याख्या— (निरु०-) तद् यानि नामानि प्राधान्यस्तुतीनां देवतानां तद् “दैवतम्” इति आचक्षते । 'तत्' सो । क्या ? 'प्राधान्यस्तुतीनाम्' प्राधान्य या मुख्यता से स्तुति वाले 'देवतानाम्' देवताओं के 'यानि ना- मानि' जो नाम हैं, 'तद्' “दैवतम्” वह “दैवत” प्रकरण

. हिन्दी निरुक्त ( २ ) ७ अ० १ पा० १ खं० है । यह आचार्य कहते हैं-इस प्रकरण की (दैवत) संज्ञा है। अब पहिले ( १, ६, ६ ) प्रतिज्ञा की हुई "दैवत" की व्याख्या को स्मरण कराता है— [निरु०-] सा एषा देवतोपपरीक्षा । जो पहिले ( प्रथमाध्याय के छठे पाद् छठे खण्ड में ) प्रतिज्ञा की थी कि—"तद् उपरिष्टाद् व्याख्या- स्यामः” (उसको आगे व्याख्यान) करेंगे वही यह देवता पदार्थ की विचार पूर्वक परीक्षा होगी । प्रकरण में प्रतिपादन करने योग्य देवता ( मन्त्रदेवता ) का लक्षण- [निरु०-] यत्काम ऋषिर्यस्यां देवतायाम् आर्थ- पत्यम् इच्छन् स्तुतिं प्रयुङ्क्ते तद्दैवतः स मन्त्रो भवति ॥ जिस किसी अर्थ की कामना से ऋषि जिस देवता में आर्थपत्य या अर्थ के स्वामित्व की इच्छा करता हुआ-यह देवता इस वस्तु का स्वामी है, इसी से मुझे यह वस्तु प्राप्त होगी, ऐसा जानता हुआ, स्तुति करता है, वह मन्त्र उस देवता का होता है-उस मन्त्र में वह देवता होता है (जिस किसी मन्त्र में देवता जानना हो उस मन्त्र में इस लक्षण से देवता जानना होगा) । देवता की स्तुति के स्थानभूत ऋचा के भेद- [निरु०-] तास्त्रिविधा ऋचः । जिन में कहा हुआ देवता का लक्षण भले प्रकार घट जाता है, वे ऋचाएं तीन प्रकार की होती हैं ।

हिन्दी निरुक्त (४) ७ अ० १ पा० १ खं० देवता मन्त्रों में स्तुति किये गये हैं, उन्हीं के नाम ये 'अग्नि' आदि 'देवपत्नी' पर्यन्त हैं। अन्य शब्द जो मन्त्रों में आते हैं, वे सब इनके विशेषण हैं, उनके आधिक्य के कारण वे सब पहिले ही 'निघण्टु' शास्त्र में चार अध्यायों में पढ़े गए और तद्नुसार ही निरुक्त में भी षष्ठ अध्याय तक उन्हीं की व्याख्या की गई है। यदि विशेष्य पद जो देवताओं के नाम हैं, उनकी व्याख्या न की जावे, तो विशेषण शब्दों के अर्थ- ज्ञान होने पर भी नहीं जाना जा सकता,-ये किसके विशे- षण हैं, या किसकी प्रशंसा है, सुतराम् विना विशेष्य पदार्थ के जाने और सब शब्दों के अर्थ का जानना तथा न जानना बराबर है, अर्थात्-व्यर्थ है, इस लिये मन्त्रार्थपरिज्ञान के लिये देवता पदों की व्याख्या परमावश्यक है। जैसा कि- कहा है- “यो हवा अविदितार्षेयच्छन्दोदैवतब्राह्मणेन मन्त्रेण याजयति वाध्यापयति वा स्थाणुं वर्च्छति गत्तेँवा पतति प्रवामीयते पापीयान् भवति, यात- यामान्यस्य छन्दांसि भवन्ति” (सा०वे०आ०ब्रा० १ अ० १ खं०) जो ब्राह्मण मन्त्र के ऋषि छन्द देवता तथा ब्राह्मण के जाने विना उससे यज्ञ कराता है, या अध्यापन करता है, वह जड़ता को प्राप्त होता है, गड्ढे (नरक) में गिरता है, मर जाता है, या अति पापी हो जाता है, और उस के मन्त्र बासी हो जाते हैं।

हिन्दी निरुक्त ( ५ ) ७ अ० १ पा० १ खं० दैवतकाण्ड की भूमिका का उद्देश्य । भाष्यकार यास्क मुनि दैवत काण्ड जो अग्नि आदि देवपत्नी पर्यन्त (१५१) शब्दों के रूप में है, उसकी व्याख्या करने की चिन्ता में हैं, किन्तु वह देखते हैं कि-देवता तत्व मन्त्रों का एक ऐसा मुख्य पदार्थ है, जिसके सम्बन्ध में अनेक ऐसी २ बातें जानना आवश्यक हैं, जिनके जाने बिना यदि देवता वाचक शब्दोंके अर्थों का ज्ञान हो भी जावे, तो भी मनुष्य के लिये अनेक स्थल ऐसे उपस्थित हो सकते हैं, जहां वह जाकर मोह को प्राप्त हो सकता है । जैसे-देवता क्या वस्तु है ? । देवता कितने हैं ? देवताओं के कैसे आकार हैं ? देवताओं का परिवार कैसा है ? उनके कौन २ स्थान हैं ? कौन २ सी वस्तुएँ उनकी निजकी हैं, एवम् जहां उनकी स्तुति होती है, उन मन्त्रों के कितने भेद हैं और जहां मन्त्रों में देवता का निश्चय नहीं होता, वहां उसका कैसे निर्णय किया जावेगा इत्यादि ९ बातों के निर्णय के अर्थ पहिले तीन पादों में एक विस्तृत भूमिका लिखते हैं, जिसके पढ़ने से उक्त प्रकार के सब सन्देह निवृत्त हो जाते हैं। दैवत काण्ड की भूमिका के लिखने में यही उद्देश्य है । मन्त्र का स्वभाव । प्रत्येक मन्त्र में दो बातें अवश्य होती हैं । एक यह कि-ऋषि के द्वारा देवता की स्तुति हो, और दूसरी यह है कि-ऋषि उस स्तवनीय देवता से किसी को मांगे । ऋषि । मन्त्र में किसी देवताको सम्बोधन करके स्तुति करने वाला ऋषि होता है, या जिसको उस मन्त्र का दर्शन हुआ हों, वह ऋषि होता है । ऋषि स्त्रीप्रकृति या पुरुष-

हिन्दी निरुक्त ( ६ ) ७ अ० १ पा० २ खं० प्रकृति दोनों ही प्रकार का होता है, किन्तु अधिकांश पुरुष- प्रकृति । एवम् देवता भी ऋषि होता है, तथा अन्य दिव्य पुरुष भी । ऋषि मन्त्र का कर्त्ता या आद्य वक्ता नहीं होता किन्तु उनका उस मन्त्र में ऋषित्व यही होता है, कि उसे उस मन्त्र का तपोबल से दर्शन हुआ है । मन्त्र स्वतः अनादि तथा नित्य है । " द्रष्टार ऋषयः " (का०सर्वा०कं० १) अर्थात्-मन्त्रके द्रष्टा या साक्षात्कार करने वाले ऋषि होते हैं। देवता । प्रत्येक मन्त्र या सूक्त आदिमें वही देवता होता है, जिसकी वहां स्तुति हो, तथा प्रार्थित अर्थ का प्रभु कहा गया हो । फलका सम्बन्ध । मन्त्र में जिस फल की प्रार्थना की गई होती है, वह प्रार्थना यद्यपि ऋषि की ओर से होती है, तथापि ऋषि का सम्बन्ध नित्य मन्त्र में दर्शन मात्र से होता है, इस से उसका फल प्रयोग करने वाले अधिकारी को होता है ! क्योंकि-नित्य मन्त्रका दर्शन तपोबल से कल्पान्तर में दूसरे ऋषि को भी हो सकता है, इसी से उसका फल ऋषि में आबद्ध नहीं ॥१॥ ( खं० २ ) प्रथमा विभक्ति में परोक्षकृता ऋचाका उदाहरण- [निरु०- ] " इन्द्रो दिव इन्द्र ईशे पृथिव्याः" [ ऋ० सं० ८, ४, १५, ५ ] ॥ इस ऋचा का वैश्वामित्र (विश्वामित्र का पुत्र ) रेभ ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द और सूर्य्यस्तुत्येकाह निष्केवल्यमें विनि- योग है।

हिन्दी निरुक्त (७) ७ अ० १ पा० ३ सू० 'इन्द्रः' माध्यमिक देव (पर्जन्य) 'दिवः ' द्युलोक को 'ईशे' (ईष्टे) ईशन करता है शासन करता है, 'इन्द्रः (एव) इन्द्र ही 'पृथिव्याः' पृथिवी को 'ईशे' ईशन करता है या शासन करता है ॥ द्वितीया में उदाहरण- [ निरु०- ] " इन्द्रमिद् गाथिनो बृहत् " [ ऋ० सं० १, १, १३, १ ]॥ इस ऋचाका मधुच्छन्दस् ऋषि और महाव्रत में महदुक्थ शिरस् पे शस्त्र (शस्त्रावयव) है । 'गाथिन. !' (सामगाः) हे सामके गान करने वालो ' 'इन्द्रम् इत्' (इन्द्रम्-एव) इन्द्र को ही 'बृहत्' (बृहतां साम्ना) बृहत् साम से (अभिष्टुत) आभिमुख्यसे स्तुति करो । तृतीया में उदाहरण-- (निरु०) "इन्द्रेणैते तृत्सवो वेविषणाः" (ऋ० सं० ५, २, २७, ५)। इस ऋचा का वसिष्ठ ऋषि, इन्द्र देवता महाव्रत मे निष्केवल्य दक्षिण पक्ष में शस्त्र है । 'एते' (मेघाः) ये मेघ 'इन्द्रेण' इन्द्रसे 'तृत्सवः' (दारयितव्याः) विदारण करने योग्य 'वेविषाणाः' और व्याप्यमान होते हुए (आप इव) जलों के समान (केनचित् सृष्टाः) किसी से प्रेरित हुये (नीचीः) नीचे २ (अगच्छन्) चले गए । चतुर्थी में उदाहरण- [ निरु०- ] "इन्द्राय साम गायत" (ऋ०मं० ६, ७, १, १) ।

हिन्दी निरुक्त ( ८ ) ७ अ० १ पा० २ खं० इस ऋचाका नृमेधस् ऋषि सात्त्रिकअहनों में स्तोत्रियानु- रूपवर्ग में तृतीय सवन में ब्राह्मणाच्छंसी के शस्त्र में विनि- योग है। हे ( उद्गातारः ? ) साम के गाने वालो ! ' इन्द्राय ' इन्द्रके लिये 'साम' साम को ' गायत ' गाओ ॥ पञ्चमी में उदाहरण— ( निरु०- ) “ नेन्द्रादृते पवते धाम किञ्चन ” [ऋ० सं० ७, २, २२, १] । “सूर्यस्येव ०—० किञ्चन ” वैश्वामित्र रेणु ऋषि, जगती छन्द और पवमान सोम देवता है। ( सोमः ) सोम इन्द्रात्-ऋते इन्द्रंवर्जयित्वा ) इन्द्रको छोड़ कर “ न किञ्चन धाम ( देवतान्तरम् ) पवते ( गच्छति)” किसी दूसरे देवता को नहीं जाता है । षष्ठी में उदाहरण— ( निरु०—) “ इन्द्रस्य नु वीर्याणि प्रवोचम् ” [ऋ०सं० १, २, २६, १] । “इन्द्रस्य नु०—०पर्वतानाम्” इस ऋचाका हिरण्य- स्तूप ऋषि है, और यह निष्केवल्य में शस्त्र है । ( अहम् ) मैं 'इन्द्रस्य' इन्द्र के 'वीर्याणि' (वीरकर्माणि) बीर कर्मों को 'प्रवोचम्' ( ब्रवीमि ) कहता हूं । सप्तमी में उदाहरण- (निरु०-)“इन्द्रे कामा अयंसत” इति ( ) हे (स्तोतारः ! ) स्तुति करने वालो ! ऋत्विजो ! 'कामाः'

हिन्दी निरुक्त ( ६ ) ७ अ० १ पा० २ खं० (दिव्याः पार्थिवाश्च) द्युलोक में होने वाले और पृथिवी में होने वाले सब काम “इन्द्रे अयंसत ” इन्द्र में उपनिबद्ध या आश्रित हैं—वही सब कामों का देने वाला है। प्रत्यक्षकृत ऋचा का लक्षण— (निरु०–) अथ प्रत्यक्षकृता मध्यमपुरुषयोगाः, 'त्वम्' इति च एतेन सर्वनाम्ना ॥८॥ 'अथ अनन्तर जो मन्त्र (ऋचाएं) मध्यम पुरुष की (जा- यसे, जहि, आगच्छ आदि) क्रिया से युक्त हों और 'त्वम्' (युवाम् यूयम्) इस सर्वनाम से देवता कहा गया हो, वे प्रत्यक्ष- कृत हैं। प्रत्यक्षकृत ऋचा का उदाहरण— (निरु०–) “त्वमिन्द्रबलादधि (सहसोजात ओ- जसः। त्वं वृषं वृषेदासि)” (ऋ० सं० ८,८,११,२)। इस सूक्त के देवजामि ऋषि हैं और महारात्रिक पर्याय में प्रशास्ता के स्तोत्र में विनियोग है । 'इन्द्र!' हे इन्द्र 'त्वम्' तू 'बलात्' बल से 'अधिजायसे' अधिक होता है। इस मन्त्र में 'त्वम्' यह पद और 'अधि- जायसे' यह मध्यम पुरुष की क्रिया दोनों देवता के लिये हैं, इस से यह प्रत्यक्षकृत है। दूसरी प्रत्यक्षकृत ऋचा— [निरु०] “विनइन्द्र मृधो जहि” (ऋ०सं० ८, ८,१०,४) इति

हिन्दी निरुक्त (१०) ७ अ० १ पा० २ खं० इन्द्र !' हे इन्द्र 'नः' हमारे (एतान्) इन 'मृधः' युद्ध करने वाले शत्रुओं को 'विजहि' नाश कर । जहां स्तुति करने वाले (ऋत्विज्) प्रत्यक्ष हैं और देवता परोक्ष, ऐसी ऋचाओं की सम्भावना- (निरु०) अथापि प्रत्यक्षकृताः स्तोतारो भवन्ति परोक्षकृतानि स्तोतव्यानि । और भी स्तोता (स्तुति करने वाले) 'त्वम्' आदि पद से कहे जाने के कारण प्रत्यक्ष होते हैं और स्तोतव्य देवता परोक्ष । उदाहरण- [निरु०] “माचिदन्यद्विशंसत” [ऋ० सं० ५, ७, १०, १) इस ऋचा का प्रगाथ ऋषि, बृहती छन्द और तृच अशी- तिओं में विनियोग है। हे (स्तोतारः !) स्तुति करने वालो ! (यूयम्) तुम 'अन्यद् दूसरे किसी देवता को 'मा' मत 'विशंसत' विविध स्तुतियों से स्तुति करो। यहां स्तोता “यूयम्” और “विशंसत” इस क्रिया पद से उक्त हैं, इस से प्रत्यक्ष हैं, और देवता परोक्ष पद का वाच्य है। दूसरा उदाहरण- [निरु०] “कण्वा अभिप्रगायत” [ऋ०सं०१,३, १२, १] इस ऋचा का कण्व ऋषि है। त्रैलीन हविष की याज्या