भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 787

हिन्दी निरुक्त ( १५ ) ७ अ० १ पा० ३ खं० 'मुखेन' मुख से 'सुवर्चाः' सुन्दर तेज वाला, 'कर्णाभ्याम्' और कानों से 'सुश्रुत्' सुन्दर श्रवण शक्ति वाला 'भूयासम्' हो जाऊं । मन्त्रों में स्तुति के अभाव में स्तुति और कामना के अभाव में कामनो जोड़ लेना चाहिये, ऐसा करने से मन्त्र पूर्ण होजाता है। इस प्रकार स्तुति आदि से रहित मन्त्र आधिक्य से कहां है ? [निरु०-] तदेतद् बहुलम्-आध्वर्यवे याज्ञेषु च मन्त्रेषु । सो यह बहुत करके आध्वर्यव ( यजुर्वेद ) में और यज्ञ सम्बन्धी मन्त्रों में है। तीसरा और चौथा विशेष- [निरु०-] अथापि शपथाभिशापौ । और भी शपथ (सौ या क़सम) और शाप ( कोसना )। कुछ मन्त्र ऐसे हैं जिन में न स्तुति है, और न कामना ही, किन्तु क्या तो किसी के मिथ्या आक्षेप को झूठा ठहराने के लिये ईश्वर से दण्ड स्वरूप अपने ऊपर अनिष्ट की झोंकी को मांगना, या किसी से पीडित होकर उसके लिये बुराई को चाहना ही कहा गया है। शपथ का उदाहरण- [निरु०-] “अद्यामुरीय यदि यातुधानो अस्मि” ऋ०सं०५,७,७,५,] वसिष्ठ ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द, रक्षोहन् (राक्षसों को मारने वाले) इन्द्रा सोम देवते, राक्षसोंकी निवृत्ति के अर्थ “इन्द्रा