भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 788

' हिन्दी निरुक्त ( १६ ) ७ अ० १ पा० ३ खं० सोम" यह पचीस (२५) ऋचाओं का सूक्त जपा जाता है, उसकी पन्दरहवीं ऋचा है (सा०भा०) "यदि यातुधानः अस्मि" यदि मैं वशिष्ठ राक्षस हूं "अद्यामुरीय" तो आज ही मरजाऊं । शाप को उदाहरण- [ निरु०- ] “अधा स वीरैर्दशभि र्वियूयाः" इति ॥ ( ऋ० सं० ५, ७, ७, ५) ॥ 'अध' यदि ऐसा होकि-' मैं वसिष्ठ और तू राक्षस' तो सो तू आज ही दश पुत्रों से वियुक्त होजा । पांचवां विशेष- [ निरु०- ] कथापि कस्याचिद् भावस्य आचि- ख्यासा ॥ और भी मन्त्रोंमें किसी भावके कहने की इच्छा होती है । उदाहरण- [ निरु०- ] [क] “न मृत्युरासीदमृतं न तर्हि" ( ऋ० सं० ८, ७, १७, १ ) त्रिष्टुप् छन्द, परमेष्ठी नाम प्रजापति ऋषि, आकाश आदि पदार्थों की सृष्टि स्थिति और प्रलय आदि यहां प्रति- पादन किये जाते हैं, इससे उनका कर्त्ता परमात्मा देवता और विनियोग पूर्वके तुल्य । (सा० भा० ) 'तर्हि' इस जगत् की जब उत्पत्ति न हुई थी, तब मृत्यु नहीं था, क्योंकि- उस समय मरने वाला मनुष्य आदि कोई नहीं था । और 'अमृत' अमरपणा भी नहीं था, क्योंकि- मृत्यु नहीं था ।