निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 789, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १७ ) ७ अ० १ पा० ३ खं० (निरु०-) (ख) “ तम आसीत्तमसागूल्हमग्रे ” ( ऋ०सं० ८, ७, १७, ३ ) ‘ तमः ’ अंधेरा ही था, अति अंधेरे से ( सब ) ढंका हुआ था । छठा विशेष- (निरु०-) अथापि परिदेवना कस्माच्चिद्भावात् ॥ और भी किसी कारण से विलाप भी मन्त्रोंमें होता है । उदाहरण- ( निरु०- ) “ सुदेवो अद्य प्रपतेदनावृत् ” ॥ ( ऋ० सं० ८, ५, ३, ५ ) पुरूरवा ऋषि, त्रिष्टुप् छन्दः, परिदेवना । ‘सुदेवः’ वह शोभन ( अच्छा ) देव है, जो इस प्रिया उर्वशी से वियुक्त होकर ‘अद्य’ आज ही ‘प्रपतेत्’ गिरे,-ऐसा गिरे कि ‘अनावृत्’ फिर संसारमें न लौटे। यहां ऋषि विषय लम्पटता के दुःखरूप परिणाम की स्थिति को दिखाता है, कि लोक इसे भले प्रकार जानकर इस में न फंसे । और विलाप का उदाहरण- (निरु०-) “न विजानामि यदि वेदमस्मि” इति ॥ दीर्घतमा ऋषि और अस्यवामीय सूक्त । “न विजानामि” मैं यह अच्छी तरह नहीं जानता, “यदि वा इदम् अस्मि” मैं यह कारण ब्रह्म हूं, या उसका कार्य रूप द्वैत जगत् । यहां पर संशय ही विलाप है । सातवां और आठवां विशेष-