निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १८ ) ७ अ० १ पा० ३ खं० ( निरु०- ) अथापि निन्दाप्रशंसे ॥ और भी मन्त्रोंमें कहीं निन्दा ही है,और कहीं प्रशंसा ही। निन्दा में उदाहरण- ( निरु०- ) "( मोघमन्नं विन्दते अप्रचेताःसत्यं ब्रवीमि वधइत् स तस्य । नार्थमणं पुष्यति नो सखायम्- ) केवलाघो भवति केवलादी ॥" ( ऋ० सं० ८, ६, २३, १ ) भिक्षु नाम आङ्गिरस ( अङ्गिरस् का पुत्र ) इसका ऋषि। त्रिष्टुप् छन्द। दान न करने वाले की निन्दा। वृथा ही अन्न को प्राप्त होता है, वह उत्तम बुद्धि वाला नहीं है, मैं सच कहता हूं, उसका वह वध (मरना) ही है, जो आदित्य का, ( तथा ) सखा ( मनुष्य ) का पोषण नहीं करता है, केवल पाप का भागी होता है,-जो अकेला ही खाता है ॥ गीता में भी कहा है- “भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्” अर्थात्- वे पाप को ही भोगते हैं, जो अपने लिये पकाते हैं। प्रशंसा में उदाहरण-- ( निरु०- ) “भोजस्येदं पुष्करिणीव वेश्म” ( ऋ० सं० ८, ६, ४, ५ ) दक्षिणा नाम प्रजापति की पुत्री ने अपनी स्तुति से