भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 792, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 792

हिन्दी निरुक्त ( २० ) ७ अ० १ पा० ४ खं० ( निरु०- ) तद् ये अनादिष्टदेवता मन्त्राः तेषु देवतोपपरीक्षा ॥ सो, जो मन्त्र अनादिष्ट देवत हैं-जिनमें देवता का आदेश ( कथन या लिङ्ग ) नहीं उनमें देवता की उपपरीक्षा (प्रान पूर्वक विचार ) होगी, अथवा उपपत्ति (युक्ति) पूर्वक परीक्षा होगी-यहां से आगे परीक्षा की जावेगी । यज्ञ में और यज्ञाङ्ग (यज्ञके भाग) में जो अनादिष्ट देवता मन्त्र हैं, उनमें देवता का निर्णय- (निरु०-) यद्देवतः स यज्ञो वा यज्ञाङ्गं वा तद्देवता भवन्ति ॥ अथवा जिस देवता का वह यज्ञ हो, अथवा जिस देवता का वह यज्ञाङ्ग हो, उस देवता के वे मन्त्र होते हैं । अर्थात्- मन्त्र में जब कोई देवता विशेष का बोधक लिङ्ग न हो, तो, उसके विनियोग को देखना,-वह किस देवता के यज्ञ में या यज्ञाङ्ग में विनियुक्त है, जिस देवता का वह यज्ञ हो या यज्ञाङ्ग, उसी देवता का वह मन्त्र भी जानना । प्रयोजन यह कि मन्त्रों का कर्म से नित्य संबन्ध है, कोई मन्त्र भी कर्म सम्बन्ध से रहित नहीं है, और जिस प्रकार मन्त्र देवता के बिना नहीं होता, उसी प्रकार कर्म भी देवता के बिना नहीं होता । क्योंकि-मन्त्र जिस प्रकार देवता की स्तुति के लिये होता है, उसी प्रकार कर्म भी देवतो के ही आराधन के लिये होता है, सुतराम् मन्त्र और कर्म दोनों एक देवता में समा- नाधिकरण होते हैं, इसीसे जब मन्त्र में देवता का पता न चले, तो उसके सम्बन्धी कर्म में देखना चाहिये, कर्म में देवता का अधिकार अवश्य बताया हुआ होता है। जैसे-जिसका

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