भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 793

हिन्दी निरुक्त ( २१ ) ७ अ० १ पा० ४ खं० बांयां हाथ उसीका दांहिना, जिसका कर्म उसी का मन्त्र । जो अनादिष्ट दैवत मन्त्रयज्ञ के सम्बन्धसे रहित हैं, उनमें देवता का निर्णय-- (निरु०-) अथान्यत्र यज्ञात् प्राजापत्या इति याज्ञिकाः ॥ यज्ञसे अन्यत्र वैसे मन्त्र प्रजापति देवता के होते हैं, यह याज्ञिक लोग मानते हैं । उन्हीं के लिये नैरुक्त आचार्यों का मत-- (निरु०-) नाराशंसा इति नैरुक्ताः ॥ वैसे मन्त्रों का 'नराशंस' देवता होता है, यह नैरुक्त मानते हैं । [ कात्थक्य आचार्य के मत में 'नराशंस' नाम यज्ञ का है, और शाकपूणि आचार्य के मतमें अग्नि का । ] उसी में दूसरो मत- (निरु०-) अपि वासा कामदेवता स्यात् ॥ अथवा वह इच्छित देवता हो-- अनादिष्ट दैवत मन्त्रोंमें पुरुष का जो कोई भी इष्ट देवता हो, वही देवता मानना । क्योंकि-विशेष्य (मुख्य) पद से रहित, केवल विशेषण पदों वाले मन्त्रों का सर्वत्र अधिकार है। जैसे 'नील' 'पीत' आदि शब्द घट पट आदि द्रव्यों के सामान्य से विशेषण हो जाते हैं, ऐसे ही बिना देवताके मन्त्र प्रत्येक देवतामें चले जाते हैं । और मत- (निरु०- ) प्रायोदेवता वा ॥ (क) 'प्रायः' यह शब्द अधिकार का बोधक है। जिस