भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 795, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 795

हिन्दी निरुक्त ( २३ ) ७ अ० १ पा० ५ खं० यज्ञ क्या ? विष्णु । 'विष्णु' क्या ? आदित्य (निरुक्तमतमें) 'देवता' अग्नि कैसे ? “ अग्निर्वै सर्वा देवताः ” अग्नि ही सब देवता हैं। यह श्रुति है। प्रथम पक्ष में-'यज्ञश्चासौ देवता यज्ञदेवता, तस्या- ऽयं याज्ञदैवतः' ऐसी व्युत्पत्ति होती है। इस व्युत्पत्ति में 'देवदत्त ब्राह्मण' इस वाक्यके समान पहिला यज्ञ पद विशेष (विष्णु) को बोधक है और दूसरा देवता पद देवता सामान्य का। और दूसरे पक्षमे-'यज्ञे भवं याज्ञम्' याज्ञं दैवतं यस्य स याज्ञदैवतो मन्त्रः ऐसी व्युत्पत्ति होती है। इस व्युत्पत्ति में यज्ञ शब्द कर्म का बोधक है, और देवता शब्द श्रुति बल से अग्नि देवता का बोधक हो जाता है। यही बात यहां ध्यान में देने योग्य है। कहीं मन्त्रों में अदेवता वस्तुएं भी देवता के समान स्तुति की जाती है, वहां देवता बुद्धि कैसे होगी ? यह प्रश्न- (निरु०-) अपि हि अदेवता देवतावत् स्तूयन्ते, यथा अश्वप्रभृतीनि ओषधिपर्यन्तानि । अदेवता = जो देवता नहीं, वे भी देवताओं के समान स्तुति किये जाते हैं, जैसे घोड़े आदि ओषधियों तक ॥४॥ ( खं० ५ ) अश्व आदि के समान और भी अदेवता वस्तुएं देवता के समान स्तुति की जाती हैं- (निरु०-) अथापि अष्टौ द्वन्द्वानि । और भी आठ ( ८ ) द्वन्द्व (जोड़े) हैं-अश्व आदि चेतन तो हैं और ये आठ द्वन्द्व तो सब के सब जड हैं, इनकी स्तुति किसी प्रकार संगत नही हो सकती ।

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