भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 796

हिन्दी निरुक्त ( २४ ) ७ अ० १ पा० ५ खं० [ आठ द्वन्द्व-(१) उलूखलमुसले ( २ ) हविर्धाने ( ३ ) द्यावापृथिवी (४) विपाट् छुतुद्री (५) आर्ती ( ६ ) शुनाशिरौ (७) देवी जोष्ट्री (८) देवी ऊर्जाहुती । ] पूर्वोक्त दो वाक्यों में ऐसी वस्तुओं के समूह दिखाये हैं, जिन में कुछ प्राणी या चेतन हैं, और कुछ अप्राणी या अचे- तन हैं। १ से अश्व आदि चेतन प्राणी, और अक्ष (पासे) आदि अचेतन (जड़ = अप्राणी) । उनमें जो जड़ हैं, वे सर्वथा स्तुति के अयोग्य हैं ही, किन्तु जो अश्व आदि चेतन हैं, वे भी वर्त्तमान समीप वस्तु को ही कुछ समझ सकते हैं, परन्तु भूत (बीती हुई) भविष्यत् ( आगे आने वाली ) बातको बिलकुल नहीं समझते और न उन्हें हित अहित का ही बोध है, इस से उनकी स्तुति की भी जावे, तो वे स्तुति के अभिप्राय को नहीं समझ सकते तथा उन में कोई वर देने का सामर्थ्य नहीं है, अतः वे स्तुति के योग्य नहीं हैं, ऐसी शिष्य की संभावना को दिखाते हैं— ( निरु०- ) सन मन्येत आगन्तून्-इव अर्थान् देवतानाम् । वह (शिष्य) न मानेगा, आगन्तु = अनित्य मनुष्यों के अश्व आदिकों के समान देवताओं के अर्थों को = घोड़े आदि साधनों को, कि-इन में पूर्वोक्त देवता का लक्षण अविरुद्ध है, या घटेगा । अर्थात्-शिष्य यह नहीं मान सकता, कि ये देवताओं के अश्व आदि देवता के रूप में स्तुति किये जाने योग्य हैं, या इनमें देवताओं का लक्षण घटता है। क्योंकि ?-