भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 798

देवता हैं। इन दोनों मतों में आत्म संख्या के विरोध का परिहार- (निरु०-) एकस्य आत्मनः अन्ये देवाः प्रत्य- ङ्गानि भवन्ति । एक आत्मा के और देव (आत्मा) प्रत्यङ्ग (भाग) होते हैं। अर्थात्-जो जिसका अङ्ग होता है, वह उससे भिन्न नहीं होता है। क्यों कि- अङ्ग अङ्गी को छोड़ नहीं सकते और न उससे वे अलग देखे ही जाते हैं, ऐसे ही अङ्गों से प्रत्यङ्ग (उनके भाग) अलग नहीं होते इससे- नैरुक्त मत में अग्नि के जातवेदस् आदि, इन्द्र के वायु आदि और सूर्य के भग आदि अङ्ग तथा शकुनि और अश्व आदि प्रत्यङ्ग हैं। इनमें अङ्गी से अङ्गों और अङ्गों से प्रत्यङ्गों का अभेद है। अतः उस मत में तीन से अधिक संख्या नहीं बढ़ती। और- वेदान्ती (आत्मवित्) के मत में वही एक महान् आत्मा अग्नि इन्द्र और सूर्य आदि अङ्गों और अश्व शकुनि आदि प्रत्यङ्गों के रूपों को धारण या अनुभव करता है, तथा वैसी अवस्था में वह अनेक रूप से स्तुति किया जाता है, इस रीति पर दोनों मतों की आत्म संख्याओं में किसी प्रकार का वि- रोध नहीं है। आत्मवित् के मत में एक आत्मा, नैरुक्तों के मत में तीन और याज्ञिकों के मत में असंख्य हैं। इन में याज्ञक लोगों के मत में एक आत्मा का अनेक होना संभव नहीं और न आवश्यक ही है, इससे उन के मत में पूर्व समाधान नहीं